वाराणसी: शिक्षा के साथ पोषण की नई मिसाल, सरकारी स्कूल की छात्राओं ने तैयार की ‘किचन गार्डन
वाराणसी। उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी अब शिक्षा और नवाचार के क्षेत्र में भी नए कीर्तिमान स्थापित कर रही है। जिले के चोलापुर ब्लॉक के परिषदीय विद्यालयों ने ‘सीखने के साथ करने’ (Learning by Doing) के सिद्धांत को धरातल पर उतारते हुए एक प्रेरणादायक उदाहरण पेश किया है। यहाँ की छात्राओं ने अपनी कड़ी मेहनत से स्कूल परिसर की बंजर पड़ी जमीन को लहलहाती सब्जियों के बाग में तब्दील कर दिया है।
खुद बोए बीज, अब काटेंगी फसल
शासन की मंशा के अनुरूप, चोलापुर ब्लॉक के तीन प्रमुख विद्यालयों—कंपोजिट पूर्व माध्यमिक विद्यालय (पठखौली), पूर्व माध्यमिक विद्यालय (भदवा) और पूर्व माध्यमिक विद्यालय (निया) की छात्राओं ने इस अनूठी पहल की कमान संभाली।
छात्राओं ने केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न रहकर, मिट्टी तैयार करने से लेकर, बीज रोपण, जैविक खाद के उपयोग और नियमित सिंचाई की पूरी जिम्मेदारी खुद उठाई। आज इन स्कूलों के परिसरों में हरी-भरी सब्जियां नजर आ रही हैं, जो न केवल देखने में सुंदर हैं बल्कि पूरी तरह से शुद्ध और जैविक (Organic) भी हैं।
मिड-डे मील की थाली होगी और भी पौष्टिक
इस पहल का सबसे बड़ा लाभ बच्चों के स्वास्थ्य को मिलने वाला है। अब तक स्कूलों में मध्याह्न भोजन (Mid-Day Meal) के लिए बाजार से सब्जियां खरीदी जाती थीं, जिनमें अक्सर कीटनाशकों और रसायनों का डर बना रहता था। लेकिन अब इन स्कूलों के बच्चों को अपनी ही क्यारियों में उगी ताजी, रसायन मुक्त और पोषक तत्वों से भरपूर सब्जियां खाने को मिलेंगी।
शिक्षकों का मानना है कि जब बच्चे खुद के द्वारा उगाई गई सब्जियां खाएंगे, तो उनमें पौष्टिक भोजन के प्रति रुचि बढ़ेगी और वे प्रकृति के प्रति अधिक संवेदनशील बनेंगे।
‘लर्निंग बाई डुइंग’: रटंत विद्या से हटकर व्यावहारिक ज्ञान
यह प्रोजेक्ट शासन की ‘लर्निंग बाई डुइंग’ योजना का हिस्सा है। इसका मुख्य उद्देश्य बच्चों को किताबी बोझ से बाहर निकालकर व्यावहारिक जीवन के कौशल सिखाना है।
- कृषि ज्ञान: बच्चों ने सीखा कि किस मौसम में कौन सी फसल उगाई जाती है।
- टीम वर्क: समूह में काम करने से बच्चों में सहयोग की भावना विकसित हुई।
- पर्यावरण संरक्षण: जैविक खेती के जरिए बच्चों ने पर्यावरण को सुरक्षित रखने का तरीका जाना।
अभिभावकों और ग्रामीणों में उत्साह
छात्राओं की इस उपलब्धि से न केवल शिक्षक बल्कि ग्रामीण और अभिभावक भी बेहद खुश हैं। विद्यालय प्रबंधन समिति के सदस्यों का कहना है कि इस तरह के प्रयासों से सरकारी स्कूलों के प्रति लोगों का नजरिया बदल रहा है। यह पहल अन्य ब्लॉकों के स्कूलों के लिए भी एक रोल मॉडल साबित हो रही है।
निष्कर्ष
वाराणसी के इन विद्यालयों ने साबित कर दिया है कि यदि सही मार्गदर्शन मिले, तो छोटे-छोटे प्रयास भी बड़ा बदलाव ला सकते हैं। छात्राओं की यह ‘मेहनत की फसल’ न केवल उनकी थाली का स्वाद बढ़ाएगी, बल्कि उनके आत्मविश्वास को भी नई ऊंचाइयों पर ले जाएगी।