मथुरा

मथुरा में कुदरत का कहर: आंधी-बारिश से गेहूं की फसल जमीन पर बिछी, दाने-दाने को मोहताज हुआ अन्नदाता

मथुरा। उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में कुदरत ने एक बार फिर अन्नदाता पर बेरहमी दिखाई है। बुधवार देर रात और गुरुवार सुबह हुई मूसलाधार बारिश और तेज आंधी ने सैकड़ों एकड़ में लहराती गेहूं की फसल को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है। जो फसल कुछ ही दिनों में कटकर घर आने वाली थी, वह अब खेतों में पानी के बीच बिछी हुई है। किसानों की आंखों के सामने उनकी साल भर की मेहनत मिट्टी में मिल गई है, जिससे पूरे ब्रज क्षेत्र में मातम का माहौल है।

तैयार फसल पर मौसम की मार

​मथुरा के छाता, चौमुहां, गोवर्धन और आसपास के देहात क्षेत्रों में मौसम का मिजाज अचानक बिगड़ गया। तेज हवाओं के झोंकों ने पककर तैयार खड़ी गेहूं की बालियों का बोझ सहन नहीं करने दिया और फसलें जमीन पर गिर गईं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, इस स्थिति को ‘लॉजिंग’ कहा जाता है, जिससे न केवल कटाई में समस्या आती है, बल्कि दानों की गुणवत्ता और चमक भी खत्म हो जाती है।

किसानों का दर्द और बेबसी:

क्षेत्र के किसान कुंपी पहलवान, नरवीर और जसमत ने अपनी आपबीती सुनाते हुए बताया कि इस बार फसल बहुत अच्छी थी। उन्हें उम्मीद थी कि इस पैदावार से पिछला कर्ज चुका पाएंगे और घर की जरूरतों को पूरा करेंगे। लेकिन कुदरत के इस कहर ने उनकी सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। किसानों का कहना है कि वे पहले ही धान की फसल की बर्बादी झेल चुके थे, और अब गेहूं की इस मार ने उन्हें ‘दाने-दाने को मोहताज’ कर दिया है।

खेतों की हालत देख रो पड़े किसान

​छाता और आसपास के गांवों में बृहस्पतिवार सुबह जब किसान अपने खेतों पर पहुंचे, तो वहां का मंजर देखकर उनकी रूह कांप गई। किसान नारायण सिंह और अमर सिंह ने बताया कि बुधवार रात आई आंधी इतनी तेज थी कि देखते ही देखते हरी-भरी फसलें जमीन पर सो गईं। फसल के गिरने से अब उसमें नमी बढ़ जाएगी, जिससे दाने काले पड़ सकते हैं या उनमें फफूंद लग सकती है।

प्रभावित क्षेत्रनुकसान का प्रकारप्रमुख मांग
छाता एवं देहात80% तक फसल जमीन पर बिछीतत्काल सरकारी सर्वे
चौमुहांजलभराव और आंधी से बर्बादीउचित आर्थिक मुआवजा
मथुरा ग्रामीणगेहूं की गुणवत्ता प्रभावितफसल बीमा का लाभ

प्रशासन से मुआवजे की गुहार

​पीडि़त किसानों ने उत्तर प्रदेश सरकार और जिला प्रशासन से गुहार लगाई है कि उनकी बदहाली पर ध्यान दिया जाए। किसानों की मांग है कि:

  • राजस्व टीम का गठन: तहसील स्तर पर लेखपालों की टीम गठित कर हर गांव में हुए नुकसान का पारदर्शी सर्वे कराया जाए।
  • तत्काल राहत: जिन किसानों ने फसल बीमा कराया है, उन्हें प्रक्रिया में ढील देकर तुरंत क्लेम दिलाया जाए।
  • कर्ज माफी या राहत: संकट की इस घड़ी में किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) और अन्य कृषि ऋणों में राहत दी जाए।

निष्कर्ष: अन्नदाता की पुकार

​मथुरा का किसान आज दोराहे पर खड़ा है। एक तरफ प्रकृति की मार है और दूसरी तरफ भविष्य की चिंता। अगर सरकार ने समय रहते सुध नहीं ली, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसका गहरा असर पड़ेगा। अब सभी की नजरें शासन के अगले कदम पर टिकी हैं कि क्या सरकार इन आंसुओं को पोंछने के लिए कोई ठोस कदम उठाएगी?

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