अयोध्या: “हमने पराधीनता कभी स्वीकार नहीं की”, चंपत राय बोले—राजसत्ता पर निर्भर समाज का अंत निश्चित है
अयोध्या (उत्तर प्रदेश): राम नगरी अयोध्या के तीर्थ क्षेत्र पुरम में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सत्संग प्रतियोगिता का भव्य शुभारंभ हुआ। इस कार्यक्रम का उद्घाटन श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने किया। अपने संबोधन में उन्होंने भारतीय समाज के गौरवशाली इतिहास, स्वाभिमान और वर्तमान सामाजिक संरचना पर गंभीर विचार साझा किए।
चंपत राय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत का इतिहास केवल संघर्ष का नहीं, बल्कि विजय के संकल्प का इतिहास है। उन्होंने समाज को चेतावनी देते हुए कहा कि केवल सरकार के भरोसे रहना किसी भी जीवंत समाज के लिए घातक हो सकता है।
“राजसत्ता पर निर्भरता है मृत्यु के समान”
चंपत राय ने सामाजिक स्वावलंबन पर जोर देते हुए एक बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा, “जो समाज शत-प्रतिशत राजसत्ता (सरकार) पर निर्भर हो जाता है, उस समाज की मृत्यु निश्चित है।” उनका तर्क था कि भारत का समाज ऐतिहासिक रूप से कभी भी पूरी तरह राजसत्ता के अधीन नहीं रहा। भारतीय संस्कृति और परंपराओं को राजाओं ने नहीं, बल्कि समाज के भीतर के संस्कारों और संतों ने जीवित रखा है।
उन्होंने आगे कहा कि भारत लंबे समय तक बाहरी शक्तियों के अधीन रहा, हम पराधीन जरूर हुए, लेकिन हमने कभी भी उस पराधीनता को स्वीकार नहीं किया। पीढ़ी दर पीढ़ी भारतीय समाज अपनी संस्कृति और धर्म को बचाने के लिए लगातार लड़ता रहा, जिसका परिणाम आज हमारे सामने भव्य राम मंदिर के रूप में है।
महंगी होती कथाएं और वनवासी समाज
महासचिव ने धर्म के व्यवसायीकरण पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आज के दौर में आध्यात्मिक कथाएं बहुत महंगी हो गई हैं। केवल धन संपन्न लोग ही बड़े आयोजनों और कथाओं का खर्च वहन कर पा रहे हैं। ऐसे में समाज का एक बड़ा वर्ग, विशेषकर वनवासी और पिछड़े क्षेत्र के लोग, इन कथाओं के लाभ से वंचित रह जाते हैं।
इस समस्या के समाधान के रूप में उन्होंने विश्व हिंदू परिषद (विहिप) की ‘कथाकार योजना’ की सराहना की। उन्होंने बताया कि इस योजना के माध्यम से कथावाचक सुदूर वनवासी क्षेत्रों और जंगलों में रहने वाले समाज तक जाकर भगवान श्री राम के नाम का गुणगान कर रहे हैं। इससे राम नाम की धारा समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँच रही है।
भारत-नेपाल के प्रतिनिधियों की उपस्थिति
तीर्थ क्षेत्र पुरम में आयोजित इस प्रतियोगिता में केवल भारत ही नहीं, बल्कि नेपाल राष्ट्र से भी प्रतिनिधि पहुंचे। कार्यक्रम में लगभग 600 वनवासी समाज के लोगों ने हिस्सा लिया। इस अवसर पर राम मंदिर ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्रा, महंत रामशरण दास रामायणी, महंत राम अवतार दास और डॉ. सुनीता शास्त्री जैसे गणमान्य व्यक्ति मौजूद रहे।
निष्कर्ष: समाज का कर्तव्य
चंपत राय के इस भाषण का मुख्य सार यही था कि सरकार अपना काम करती है, लेकिन समाज को अपने कर्तव्यों को नहीं भूलना चाहिए। शिक्षा, संस्कार और धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए समाज को स्वयं आगे आना होगा। उन्होंने आह्वान किया कि सामूहिक प्रयास ही भारत को पुन: विश्व गुरु के पद पर आसीन करेंगे।