करोड़ों की बिल्डिंग, पर छात्राएं नदारद: 8.74 करोड़ से बने राजकीय महिला महाविद्यालय में सिर्फ 15 दाखिले
लखनऊ/सीतापुर। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर बनाए गए नए राजकीय कॉलेजों की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। ताज़ा मामला सीतापुर जिले के राजकीय महिला महाविद्यालय मिश्रिख का है, जहाँ 8.74 करोड़ रुपये की लागत से आलीशान बिल्डिंग तो खड़ी कर दी गई, लेकिन कॉलेज को छात्राएं नहीं मिल रही हैं। आलम यह है कि पूरे कॉलेज में मात्र 15 छात्राओं ने प्रवेश लिया है, जबकि बीकॉम जैसे महत्वपूर्ण कोर्स में एक भी दाखिला नहीं हुआ है।
शानदार इंफ्रास्ट्रक्चर, पर सन्नाटा
ठाकुर नगर स्थित इस तीन मंजिला महाविद्यालय का निर्माण कार्य पूरा होने के बाद 2025 में यहाँ पढ़ाई शुरू हो सकी। कॉलेज में सुविधाओं की कोई कमी नहीं है:
- 10 सामान्य क्लासरूम के साथ एक आधुनिक स्मार्ट क्लास।
- चार प्रैक्टिकल हॉल और एक सुसज्जित कंप्यूटर सेंटर।
- लैब में नए उपकरण और लाइब्रेरी में एक लाख रुपये की किताबें।
इतनी सुविधाओं और प्राचार्य समेत 7 शिक्षकों की तैनाती के बावजूद यहाँ शैक्षणिक माहौल का अभाव है। लखनऊ विश्वविद्यालय से संबद्ध इस कॉलेज में बीए में 14 और बीएससी में मात्र एक छात्रा ने प्रवेश लिया है।
क्यों नहीं आ रही हैं छात्राएं? मुख्य चुनौतियां
कॉलेज प्रशासन और स्थानीय लोगों ने कम दाखिलों के पीछे कई बड़े कारण बताए हैं:
- दुर्गम रास्ता: कॉलेज सीतापुर-हरदोई मुख्य मार्ग से लगभग दो किलोमीटर अंदर है। यहाँ तक पहुँचने के लिए सड़क टूटी हुई है और परिवहन का कोई नियमित साधन (बस या टैक्सी) नहीं है। छात्राओं को ई-रिक्शा पर निर्भर रहना पड़ता है।
- पानी की समस्या: कॉलेज के पास हेलीपैड होने के कारण ओवरहेड टैंक (पानी की टंकी) बनाने की अनुमति नहीं मिली। फिलहाल यहाँ पानी की भारी किल्लत है, जिसे दूर करने के लिए अब अंडरग्राउंड टैंक बनाने की योजना है।
- आर्थिक पिछड़ापन: यह क्षेत्र इतना पिछड़ा है कि कई छात्राएं आधी फीस भी जमा नहीं कर सकीं, जिसे बाद में कॉलेज प्रशासन ने अपनी ओर से जमा किया।
- प्रचार-प्रसार की कमी: कॉलेज नया होने के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में इसके संचालन की जानकारी समय पर नहीं पहुँच सकी।
क्या ‘Co-Ed’ बनेगा समाधान?
कॉलेज प्रशासन ने अब एक नया प्रस्ताव तैयार किया है। विभाग का मानना है कि यदि इसे केवल ‘महिला महाविद्यालय’ न रखकर ‘Co-Ed’ (छात्र-छात्राओं दोनों के लिए) कर दिया जाए, तो प्रवेश लेने वालों की संख्या में भारी बढ़ोतरी हो सकती है। क्षेत्रीय उच्च शिक्षा अधिकारी के माध्यम से शासन को इसका प्रस्ताव भेजने की तैयारी है।
उच्च शिक्षा राज्यमंत्री रजनी तिवारी ने भी इस मामले पर संज्ञान लिया है। उन्होंने कहा है कि स्थानीय विधायक और अधिकारियों से चर्चा की जाएगी कि क्या इसे को-एड करने से फायदा होगा या अन्य माध्यमों से छात्राओं की संख्या बढ़ाई जाएगी।
प्राचार्य का पक्ष
महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. सर्वेश मिश्रा का कहना है कि पिछला साल पहला सत्र था, इसलिए जानकारी के अभाव में कम दाखिले हुए। इस बार बड़े स्तर पर प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। उन्होंने यह भी मांग की है कि यदि कॉलेज तक परिवहन की बेहतर व्यवस्था हो और सहायक स्टाफ मिले, तो स्थिति में तेजी से सुधार हो सकता है।
निष्कर्ष
8.74 करोड़ रुपये की सार्वजनिक संपत्ति का सही उपयोग तभी संभव है जब वहां पढ़ने वाले विद्यार्थी हों। केवल बिल्डिंग बना देना काफी नहीं है, बल्कि कनेक्टिविटी और बुनियादी सुविधाओं पर ध्यान देना भी उतना ही जरूरी है।