लखनऊ

​सुना है क्या: यूपी की अफसरशाही के वो किस्से, जहाँ कहीं शब्दों से असहजता है तो कहीं रसूख का खेल!

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति जितनी दिलचस्प है, उतनी ही चर्चा यहाँ की ‘अफसरशाही’ (Bureaucracy) की भी होती है। सचिवालय की सीढ़ियों से लेकर जिलों के बंगलों तक, अफसरों के कारनामे अक्सर सुर्खियां बटोरते हैं। हाल ही में लखनऊ के गलियारों में तीन ऐसे किस्से चर्चा का केंद्र बने हुए हैं, जो विभाग के अंदरूनी माहौल और अफसरों की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान खड़े करते हैं।

1. साहब की नीयत या जुबान: सेहत विभाग का अजीब संकट

​पहला मामला स्वास्थ्य से जुड़े एक महत्वपूर्ण विभाग का है। यहाँ तैनात एक कद्दावर अधिकारी अपनी कार्यशैली से ज्यादा अपने ‘अंदाजे-बयां’ के लिए चर्चा में हैं। बताया जा रहा है कि साहब मीटिंग के दौरान शब्दों के चयन में अक्सर मर्यादा भूल जाते हैं। उनकी टिप्पणियाँ ऐसी होती हैं कि वहाँ मौजूद महिला अधिकारी और कर्मचारी शर्मिंदगी महसूस करने लगती हैं।

​दिलचस्प बात यह है कि उनके विभाग के लोग उन्हें ‘दिल का साफ’ बताते हैं, लेकिन उनकी जुबान ऐसी है कि लोग अब उनकी बैठकों में जाने से बचने लगे हैं। पिछले दिनों उन्होंने एक ऐसी टिप्पणी कर दी जो अब पूरे विभाग में चर्चा का विषय बनी हुई है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या ‘अच्छी नीयत’ अभद्र भाषा का लाइसेंस दे देती है?

2. पावरफुल मैडम का ‘जमीन’ का खेल

​दूसरा किस्सा लखनऊ मंडल के एक जिले में तैनात एक महिला अधिकारी का है। इन ‘पॉवरफुल मैडम’ पर आरोप है कि प्रमोशन मिलने के बावजूद उन्होंने अपने पुराने पद के अधिकारों का इस्तेमाल कर जमीन से जुड़ा एक बड़ा खेल किया। मामला तब खुला जब एक बाबू के साथ उनकी बातचीत की रिकॉर्डिंग वायरल हो गई। इस रिकॉर्डिंग में मैडम उन आरोपों को पुख्ता करती नजर आईं जो उन पर लगे थे।

​हैरानी की बात यह है कि प्रारंभिक जांच में दोषी पाए जाने और विभागीय जांच के आदेश होने के बावजूद मैडम अपनी कुर्सी पर मजबूती से डटी हुई हैं। विभाग के गलियारों में फुसफुसाहट है कि मैडम के तार ‘ऊपर’ तक इतने मजबूत हैं कि जांच की फाइलें धूल फांक रही हैं और कार्रवाई के नाम पर केवल शांति है।

3. साहब का तबादला और विभाग में जश्न

​तीसरा किस्सा शिक्षा (पढ़ाई-लिखाई) विभाग का है। यहाँ एक बड़े साहब का हाल ही में तबादला हुआ है। आमतौर पर किसी अधिकारी के जाने पर विदाई की उदासी होती है, लेकिन यहाँ नजारा उल्टा था। साहब के जाते ही विभाग के कई अधीनस्थ अधिकारियों और संस्थानों के प्रभारियों ने राहत की सांस ली है।

​चर्चा है कि साहब अपने ‘निजी कामों’ के लिए अधिकारियों को कभी भी तलब कर लेते थे। काम का दबाव ऐसा था कि छुट्टियों के दिन भी उन्हें संस्थान बुला लिया जाता था। साहब के इस रवैये से अधिकारी इतने त्रस्त थे कि उनके तबादले की खबर मिलते ही विभाग में मानों ‘त्योहार’ जैसा माहौल बन गया। अब चर्चा इस बात की है कि नए साहब का मिजाज कैसा होगा।

अफसरशाही और रसूख का संगम

​ये तीन किस्से बताते हैं कि यूपी की अफसरशाही में काम के साथ-साथ ‘रसूख’ और ‘व्यवहार’ का कितना महत्व है। जहाँ एक तरफ सरकार अनुशासन की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ ऐसे मामले सामने आते हैं जहाँ अधिकारी अपने पद का दुरुपयोग करते हैं या अपने व्यवहार से माहौल खराब करते हैं।

निष्कर्ष: सचिवालय के गलियारों में चर्चाएं तो बहुत हैं, लेकिन देखना यह है कि क्या इन शिकायतों पर कोई ठोस कार्रवाई होती है या ‘पावरफुल’ होने का टैग इन अफसरों को हमेशा बचाए रखेगा।

डिस्क्लेमर: यह लेख विभाग में चल रही चर्चाओं और मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष की छवि धूमिल करना नहीं, बल्कि प्रशासनिक गलियारों के माहौल को दर्शाना है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *