प्रयागराज

​भीषण गर्मी में गेहूं खरीद की अव्यवस्थाओं पर भड़का ‘किसान नौजवान संघर्ष मोर्चा’, मंडी में किसानों को बांटे छाते

उत्तर प्रदेश: प्रदेश में भीषण गर्मी और तेज धूप के बीच गेहूं की फसल बेचने के लिए मंडियों में लंबी कतारें लगी हुई हैं। ऐसे में सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को उजागर करते हुए किसान नौजवान संघर्ष मोर्चा ने मोर्चा खोल दिया है। शुक्रवार को मोर्चा के प्रतिनिधियों ने न केवल किसानों की समस्याओं को सरकार के समक्ष रखा, बल्कि धूप में तड़प रहे किसानों को राहत देने के लिए छाता वितरण भी किया।

मंडी में सुविधाओं का अभाव: न पानी, न छांव

​मोर्चा के संयोजक संदीप मिश्र के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल नवीन सब्जी मंडी पहुँचा। यहाँ बड़ी संख्या में किसान अपने ट्रैक्टर-ट्रॉलियों पर गेहूं लादकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। संदीप मिश्र ने आरोप लगाया कि क्रय केंद्रों पर किसानों के लिए मूलभूत सुविधाएं तक नहीं हैं। चिलचिलाती धूप में घंटों खड़े रहने के बावजूद न तो वहां छांव की व्यवस्था है और न ही शीतल पेयजल की। इसी के विरोध स्वरूप और किसानों को तत्काल राहत देने के लिए मोर्चा ने किसानों के बीच छाते वितरित किए।

कागजी प्रक्रियाओं में उलझा किसान

​संदीप मिश्र ने सरकार पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि किसानों को फार्मर रजिस्ट्री और खसरा-खतौनी के सत्यापन के नाम पर बेवजह दौड़ाया जा रहा है। उन्होंने कहा:

​”सरकार की व्यवस्थाएं केवल कागजों तक सीमित हैं। जटिल प्रक्रियाओं के कारण आज 70 से 80 प्रतिशत किसान अपना गेहूं सरकारी रेट के बजाय 2000 से 2100 रुपये प्रति क्विंटल के कम दाम पर बिचौलियों को बेचने पर मजबूर हैं।”

बिचौलियों के बोलबाले का आरोप

​संघर्ष मोर्चा ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि जहाँ असली किसान अपनी उपज बेचने के लिए कतारों में संघर्ष कर रहा है, वहीं क्रय केंद्रों पर बिचौलियों का गेहूं आसानी से उतारा जा रहा है। मोर्चा ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही खरीद व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ और प्रत्येक किसान का गेहूं समय पर नहीं खरीदा गया, तो किसान नौजवान संघर्ष मोर्चा एक बड़ा आंदोलन शुरू करेगा।

प्रमुख सदस्यों की उपस्थिति

​इस कार्यक्रम और विरोध प्रदर्शन के दौरान रामयश मौर्य, दिलीप पटेल, रमेश कुशवाहा, चरनजीत कहार, बेचू बियार, संतोष पटेल, विजय यादव, आकाश चौहान, शत्रुघ्न बिंद, दिनेश चेरो, अरविंद चौहान और सूरज कनौजिया सहित मोर्चा के कई सक्रिय सदस्य मौजूद रहे।

निष्कर्ष

​गेहूं खरीद के सीजन में किसानों का यह संघर्ष प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाता है। एक तरफ जहां सरकार ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘इज ऑफ डूइंग बिजनेस’ की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ अन्नदाता आज भी एक-एक दाना बेचने के लिए सरकारी दफ्तरों और मंडियों की धूल फांकने को मजबूर है।

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