पहलगाम हमला: ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का एक साल; ऐशान्या द्विवेदी बोलीं- सेना ने लिया सुहाग का बदला, अब मिले शहीदों का दर्जा
कानपुर। जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए कायरतापूर्ण आतंकी हमले को एक साल बीत चुका है, लेकिन अपनों को खोने का गम आज भी उतना ही ताजा है। इस हमले में अपने पति शुभम द्विवेदी को खोने वाली कानपुर की ऐशान्या द्विवेदी ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की पहली बरसी पर भारतीय सेना और सरकार के प्रति आभार व्यक्त किया है। ऐशान्या ने भावुक होते हुए कहा कि सेना ने आतंकवादियों को ढेर कर उनके सुहाग का बदला तो ले लिया है, लेकिन अब सरकार को इन निर्दोष नागरिकों को ‘शहीद’ का दर्जा देकर उन्हें राष्ट्रीय सम्मान देना चाहिए।
’ऑपरेशन सिंदूर’: सेना का वो जवाब जिसने बदला इतिहास
पिछले साल 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए हमले के बाद भारतीय सेना ने आतंकवादियों के खिलाफ एक विशेष अभियान चलाया था, जिसे ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का नाम दिया गया। ऐशान्या द्विवेदी का मानना है कि इस नाम का चयन उन महिलाओं के लिए एक बहुत बड़ा सम्मान था, जिनका सुहाग इस आतंकी घटना में उजड़ गया था।
ऐशान्या ने कहा, “आतंकवादी हमले पहले भी हुए, लेकिन इस बार सरकार और सेना ने जिस मजबूती और तेजी से जवाब दिया, वह हमारे जैसे पीड़ित परिवारों के लिए वास्तविक न्याय है। ऐसा बदला पहले कभी नहीं देखा गया था। सेना की इस कार्रवाई ने उन लोगों के सीने को ठंडक पहुँचाई है जिन्होंने अपनों को खोया है।”
”नाम पूछकर चलाई गईं गोलियां, फिर भी नहीं डरे”
शहीद शुभम द्विवेदी की पत्नी ऐशान्या ने उस खौफनाक मंजर को याद करते हुए बताया कि आतंकवादियों ने उस दिन निर्दोष नागरिकों का नाम पूछ-पूछकर उन्हें निशाना बनाया था। उन्होंने कहा, “वहाँ मौजूद निर्दोष लोगों ने अपना धर्म बताने में संकोच नहीं किया और गर्व से गोलियों का सामना किया। उन्होंने झुकने के बजाय बलिदान देना स्वीकार किया। ऐसे में क्या उनका बलिदान किसी सैनिक की शहादत से कम है?”
सरकार से राष्ट्रीय पहचान और शहीद के दर्जे की मांग
ऐशान्या द्विवेदी की मांग केवल आर्थिक सहायता या सहानुभूति तक सीमित नहीं है। वह चाहती हैं कि इस हमले में मारे गए निर्दोष नागरिकों को राष्ट्रीय शहीद का दर्जा दिया जाए। उनकी प्रमुख मांगें निम्नलिखित हैं:
- शहीद का दर्जा: आतंकी हमले में धर्म और देश के लिए जान गंवाने वाले नागरिकों को औपचारिक रूप से शहीद माना जाए।
- राष्ट्रीय सम्मान: इन बलिदानियों के परिवारों को वह सम्मान मिले, जो एक वीर सैनिक के परिवार को मिलता है।
- इतिहास में जगह: आने वाली पीढ़ियां याद रखें कि कैसे कुछ आम नागरिकों ने आतंकवाद के सामने घुटने टेकने से इनकार कर दिया था।
कानपुर का शुभम द्विवेदी: एक साल की टीस
कानपुर निवासी शुभम द्विवेदी की मौत ने पूरे शहर को झकझोर दिया था। आज एक साल बाद भी शुभम का परिवार उस शून्य को भरने की कोशिश कर रहा है। ऐशान्या का कहना है कि न्याय का एक हिस्सा सेना ने पूरा कर दिया है, अब दूसरा हिस्सा केंद्र सरकार के हाथों में है।