वाराणसी

शंकराचार्य का बड़ा कदम: काशी से ‘गो प्रतिष्ठा धर्मयुद्ध यात्रा’ शुरू, गाय को ‘राज्यमाता’ बनाने की हुंकार

वाराणसी: धर्म और अध्यात्म की नगरी काशी एक बार फिर एक बड़े आंदोलन की गवाह बन रही है। ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने ‘गो प्रतिष्ठा धर्मयुद्ध यात्रा’ का विधिवत शंखनाद कर दिया है। शुक्रवार को केदारघाट पर मां गंगा के आचमन और पूजन के साथ इस यात्रा की नींव रखी गई। यह यात्रा न केवल उत्तर प्रदेश की राजनीति बल्कि धार्मिक गलियारों में भी चर्चा का विषय बन गई है।

गंगा पूजन और शिवाजी महाराज का संकल्प

​शंकराचार्य ने इस यात्रा की शुरुआत के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती का विशेष अवसर चुना। उन्होंने गंगा तट पर शिवाजी महाराज के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की और उनके जीवन से प्रेरणा लेने का आह्वान किया। शंकराचार्य ने बताया कि जिस प्रकार शिवाजी महाराज ने मात्र 12 वर्ष की आयु में गोमाता की रक्षा के लिए शस्त्र उठाए थे, आज वही संकल्प दोहराने का समय आ गया है।

​उन्होंने शास्त्रों का हवाला देते हुए कहा कि सनातन धर्म में राजा का प्रथम कर्तव्य गाय, ब्राह्मण और मंदिरों की रक्षा करना है। भगवान राम से लेकर संभाजी महाराज तक, सभी ने गो-रक्षा को राष्ट्र रक्षा के समान माना है।

40 दिन का अल्टीमेटम और सरकार की चुप्पी

​इस आंदोलन की पृष्ठभूमि पिछले 40 दिनों से तैयार हो रही थी। शंकराचार्य ने उत्तर प्रदेश सरकार के समक्ष मांग रखी थी कि गाय को ‘राज्यमाता’ घोषित किया जाए और प्रदेश में पूर्ण गो-हत्या बंदी लागू की जाए। उन्होंने सरकार को 40 दिन का समय दिया था। शुक्रवार को 35 दिन पूरे होने पर, जब सरकार की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठा, तो शंकराचार्य ने ‘धर्मयुद्ध’ के मार्ग पर चलने का निर्णय लिया।

यात्रा का रूट और कार्यक्रम

​शनिवार सुबह श्रीचिंतामणि गणेश और संकटमोचन मंदिर में दर्शन-पूजन के बाद यह यात्रा लखनऊ के लिए प्रस्थान करेगी। यह यात्रा अगले चार दिनों में उत्तर प्रदेश के छह महत्वपूर्ण जिलों से होकर गुजरेगी:

  1. वाराणसी (प्रस्थान)
  2. जौनपुर
  3. सुलतानपुर
  4. रायबरेली
  5. उन्नाव
  6. लखीमपुर खीरी
  7. लखनऊ (11 मार्च को समापन)

​इन जिलों में एक दर्जन से अधिक स्थानों पर शंकराचार्य जनसभाओं को संबोधित करेंगे और लोगों को गोरक्षा के प्रति जागरूक करेंगे।

‘करपात्र गोभक्त सम्मान’ से नवाजे गए शंकराचार्य

​अखिल भारतीय सारस्वत परिषद ने शंकराचार्य के इन प्रयासों की सराहना करते हुए उन्हें प्रथम ‘करपात्र गोभक्त सम्मान’ से सम्मानित किया है। गिरीश चंद्र तिवारी और प्रो. विवेकानंद तिवारी ने उन्हें यह सम्मान प्रदान किया। घाट पर कलाकारों ने शिवाजी महाराज के जीवन पर आधारित एक लघु नाटिका भी प्रस्तुत की, जिसने उपस्थित जनसमूह में उत्साह भर दिया।

छद्म हिंदुओं को पहचानने का समय

​शंकराचार्य ने कड़े शब्दों में कहा कि आज समाज में ऐसे लोग सक्रिय हैं जो गाय और मंदिरों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। उन्होंने जनता से अपील की कि वे ‘छद्म हिंदुओं’ को पहचानें और वास्तविक धर्म के मार्ग पर चलें। उन्होंने जोर देकर कहा कि जो क्षत्रिय या नागरिक गाय की रक्षा के लिए खड़ा होता है, उसकी कीर्ति अनंत काल तक बनी रहती है।

निष्कर्ष

​शंकराचार्य की यह यात्रा 11 मार्च को राजधानी लखनऊ पहुंचेगी, जहाँ वे अपनी मांगों को लेकर हुंकार भरेंगे। अब देखना यह है कि उत्तर प्रदेश सरकार इस धार्मिक और सामाजिक दबाव पर क्या प्रतिक्रिया देती है। क्या गोमाता को राज्यमाता का दर्जा मिलेगा? यह आने वाला वक्त ही बताएगा।

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