यूपी विधानसभा: “बेलगाम हुई नौकरशाही, थानेदार तक नहीं उठाते विधायकों का फोन”, सदन में गूंजा कार्यपालिका की मनमानी का मुद्दा
लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र के दौरान मंगलवार को एक बेहद संवेदनशील और गंभीर विषय पर सदन में तीखी बहस देखने को मिली। विपक्षी दल समाजवादी पार्टी ने आरोप लगाया कि प्रदेश में नौकरशाही इस कदर बेलगाम हो गई है कि जिला स्तर के अधिकारी तो दूर, थानेदार और पटवारी तक जन प्रतिनिधियों (विधायकों) का फोन उठाना मुनासिब नहीं समझते।
विपक्ष का गंभीर आरोप: दलालों के साथ व्यस्त रहते हैं अधिकारी
नियम 301 के तहत इस मुद्दे को उठाते हुए नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय ने सदन को बताया कि कार्यपालिका पूरी तरह से विधायिका पर हावी हो चुकी है। उन्होंने क्षोभ प्रकट करते हुए कहा, “हालत यह है कि थानेदार विधायकों के फोन नहीं उठाते और अक्सर दलालों के साथ गपशप में व्यस्त रहते हैं। अधिकारी न तो कॉल बैक करते हैं और न ही किसी बैठक में होने का संदेश भिजवाते हैं।”
पांडेय ने आगे कहा कि बार-बार शासनादेश जारी होने के बावजूद अधिकारी पीठ के निर्देशों की अवहेलना कर रहे हैं, जिससे लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर हो रही है। सपा सचेतक कमाल अख्तर ने इस पर तंज कसते हुए कहा कि यह सिर्फ विपक्ष की समस्या नहीं है, बल्कि सत्ता पक्ष के मंत्रियों और विधायकों का भी यही हाल है। उन्होंने दावा किया कि भाजपा विधायक खुद स्वीकार करते हैं कि अब पटवारी भी उनका फोन नहीं उठाते।
सरकार का पक्ष: “मनमानी बर्दाश्त नहीं की जाएगी”
विपक्ष के इन तीखे हमलों पर संसदीय कार्य मंत्री सुरेश कुमार खन्ना ने सरकार का बचाव किया। हालांकि उन्होंने ‘कार्यपालिका के हावी होने’ के आरोप को सिरे से खारिज कर दिया, लेकिन यह स्वीकार किया कि जो अधिकारी फोन नहीं उठाते, सरकार उनका समर्थन नहीं करती।
खन्ना ने कड़े शब्दों में कहा, “ऐसी हरकतों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अधिकारियों को निर्देश हैं कि वे विधायकों के नंबर अपने फोन में फीड करें और यदि किसी कारणवश फोन नहीं उठा पाते हैं, तो अनिवार्य रूप से कॉल बैक करें।” उन्होंने याद दिलाया कि इसी सदन ने अनुशासनहीनता के मामले में 20 साल पुराने केस में पुलिसकर्मियों को बुलाकर सजा दी थी।
‘खतरे की घंटी’ वाला सुझाव
चर्चा में हिस्सा लेते हुए समाज कल्याण मंत्री असीम अरुण ने एक अनूठा सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि कुछ अधिकारी वाकई सुस्त या बदतमीज हो सकते हैं। इससे निपटने के लिए प्रदेश और जिला स्तर पर एक ऐसा ‘डेडीकेटेड नंबर’ होना चाहिए, जिस पर विधायक अपनी शिकायत दर्ज करा सकें कि अमुक अधिकारी फोन नहीं उठा रहा है। उन्होंने इसे ‘खतरे की घंटी’ वाला नंबर करार दिया ताकि जवाबदेही तय की जा सके।
विधानसभा अध्यक्ष का रुख
सभी पक्षों को सुनने के बाद विधानसभा अध्यक्ष ने इस मामले को रिजर्व रख लिया है। उन्होंने कहा कि वह इस विषय पर संसदीय कार्य मंत्री के साथ वार्ता करेंगे और जल्द ही इस पर एक पुख्ता व्यवस्था या दिशा-निर्देश देंगे ताकि सदन की गरिमा और जन प्रतिनिधियों के विशेषाधिकारों की रक्षा हो सके।