वाराणसी

वाराणसी: Meta AI के खिलाफ देश का पहला कानूनी मामला, शिव-पार्वती विवाह पर ‘गलत जवाब’ देना पड़ा भारी

वाराणसी। धर्म और संस्कृति की नगरी काशी से एक बेहद अनोखा और देश का अपनी तरह का पहला कानूनी मामला सामने आया है। यहाँ एक समाजसेवी ने अमेरिकी टेक दिग्गज ‘मेटा’ (Meta) के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) प्लेटफॉर्म के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया है। मामला भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह की तिथि से जुड़ी गलत जानकारी देने का है।

क्या है पूरा विवाद?

​वाराणसी के सारनाथ (तिलमापुर) निवासी समाजसेवी नागेश्वर मिश्र ने मेटा एआई से भगवान शिव के विवाह के संबंध में कुछ सवाल पूछे थे। उनके अनुसार, एआई ने इन सवालों के जो जवाब दिए, वे न केवल गलत थे, बल्कि बार-बार टोकने के बाद भी सुधारने के बजाय भ्रमित करने वाले थे।

​नागेश्वर मिश्र ने अवर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वितीय की अदालत में प्रकीर्ण वाद दाखिल किया है। उनके अधिवक्ता का दावा है कि यह भारत में एआई द्वारा दी गई जानकारी की सत्यता को लेकर कोर्ट में पेश होने वाला पहला मामला है।

AI के साथ चैट में क्या हुआ?

​वाद के अनुसार, नागेश्वर मिश्र ने मेटा एआई से पूछा कि “शिव जी का विवाह किस महीने में हुआ है?” * Meta AI का पहला जवाब: एआई ने बताया कि विवाह फाल्गुन महीने की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी (महाशिवरात्रि) को हुआ था।

  • समाजसेवी की चेतावनी: जब नागेश्वर ने इसे गलत बताते हुए मुकदमा करने की चेतावनी दी, तो एआई ने माफी मांगी।
  • Meta AI का दूसरा (गलत) जवाब: माफी मांगने के बाद एआई ने फिर से गलती की। उसने कहा कि महाशिवरात्रि माघ महीने में आती है, जबकि कुछ अन्य स्रोतों के अनुसार विवाह वैशाख महीने में हुआ था।

​इस विरोधाभासी और शास्त्र सम्मत जानकारी न होने के कारण समाजसेवी ने इसे धार्मिक भावनाओं और सूचना की सटीकता के साथ खिलवाड़ मानते हुए कानूनी कार्रवाई का मन बनाया।

अदालत ने क्या कहा?

​वाराणसी की अदालत ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सारनाथ थाने से इस पूरे प्रकरण पर विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। इस मामले की अगली सुनवाई 16 मार्च को तय की गई है। कानून विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला भविष्य में एआई की जवाबदेही (AI Accountability) तय करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है।

एआई और धार्मिक आस्था

​यह मामला उन चुनौतियों को उजागर करता है जो अत्याधुनिक तकनीक और पौराणिक तथ्यों के बीच पैदा हो रही हैं। हिंदू कैलेंडर और तिथियों की गणना अत्यंत जटिल है, जिसे अक्सर एआई एल्गोरिदम सही ढंग से समझने में विफल रहते हैं। नागेश्वर मिश्र का तर्क है कि यदि कोई मंच स्वयं को ‘सर्वज्ञ’ बताता है, तो उसे करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़े विषयों पर भ्रामक तथ्य नहीं परोसने चाहिए।

निष्कर्ष

​वाराणसी की अदालत में 16 तारीख को होने वाली सुनवाई पर पूरे देश की नजर रहेगी। क्या एक सॉफ्टवेयर या एआई मॉडल पर गलत जानकारी देने के लिए कानूनी मुकदमा चलाया जा सकता है? क्या मेटा जैसी कंपनियां अपने एआई द्वारा जनरेट किए गए कंटेंट के लिए कानूनी रूप से उत्तरदायी होंगी? इन सवालों के जवाब आने वाले समय में डिजिटल इंडिया के कानूनी ढांचे को नई दिशा देंगे।

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