गाजियाबाद

UP: ‘जो स्मार्टफोन नहीं चला सकते, उन्हें बाहर करो’, गाजियाबाद जासूसी मामले में जैश के खतरनाक मंसूबों का खुलासा

गाजियाबाद। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में पकड़े गए संदिग्ध आतंकियों और जासूसी नेटवर्क को लेकर हर दिन नए और चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं। जांच एजेंसियों की पूछताछ में यह साफ हो गया है कि पाकिस्तानी आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद अब अपने नेटवर्क में शामिल होने वाले लोगों के लिए “डिजिटल साक्षरता” को अनिवार्य बना चुका है। मुख्य आरोपी शावेज उर्फ जिहादी के मोबाइल से मिले संदेशों ने सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है।

स्मार्टफोन चलाने वालों को प्राथमिकता

​जांच में यह बात सामने आई है कि जैश के हैंडलर्स ने शावेज को स्पष्ट निर्देश दिया था कि नेटवर्क में केवल उन्हीं लोगों को रखा जाए जो स्मार्टफोन चलाने में माहिर हों। शावेज ने पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं को सात लोगों की एक सूची भेजी थी, जिसमें उनके नाम, शिक्षा और स्मार्टफोन चलाने की क्षमता का पूरा विवरण था। इस सूची में पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के लोग भी शामिल थे।

​जवाब में जैश की ओर से फरमान आया कि कम पढ़े-लिखे लोग तो चल जाएंगे, लेकिन जिन्हें स्मार्टफोन की तकनीक समझ नहीं आती, उन्हें तुरंत बाहर कर दिया जाए। संगठन का मानना है कि पकड़े जाने से बचने के लिए कोडिंग और डिजिटल संचार सबसे सुरक्षित रास्ता है।

कोडिंग और ऑनलाइन ट्रेनिंग का खेल

​गिरोह अपनी सुरक्षा को लेकर इतना सतर्क था कि अधिकतर बातचीत कोड वर्ड में की जाती थी। शावेज ने कुबूल किया है कि कई बार कोड इतने जटिल होते थे कि उन्हें समझने के लिए वह पेशे से वकील आरोपी इकराम अली की मदद लेता था। इन कोड्स को समझाने के लिए बाकायदा ऑनलाइन ट्रेनिंग दी जाती थी और वीडियो के जरिए कोडिंग की जानकारी साझा की जाती थी। पुलिस को आरोपियों के फोन से कई ऐसे ट्यूटोरियल वीडियो मिले हैं।

पढ़े-लिखे लोगों का नेटवर्क तैयार करने की साजिश

​इस नेटवर्क की सबसे डरावनी बात यह है कि यह केवल अनपढ़ या गुमराह युवाओं तक सीमित नहीं था। आरोपी इकराम अली एक वकील है, जिसे इसलिए शामिल किया गया ताकि कानूनी पेचीदगियों और पुलिसिया कार्रवाई से बचने के रास्ते निकाले जा सकें। वहीं, एक अन्य आरोपी जुनैद को एलएलबी (LLB) में दाखिला दिलाने की योजना थी ताकि भविष्य में संगठन के पास अपनी “कानूनी विंग” तैयार हो सके।

देशव्यापी विस्तार की थी योजना

​डीसीपी ग्रामीण सुरेंद्र नाथ तिवारी के अनुसार, एनआईए (NIA) और इंटेलिजेंस की टीमें मामले की तह तक जा रही हैं। जांच में पता चला है कि शावेज की गतिविधियां सिर्फ गाजियाबाद तक सीमित नहीं थीं। वह और उसके साथी (जुनैद, फरदीन, इकराम, फजरू और जावेद) नियमित रूप से जूम मीटिंग के जरिए जुड़ते थे और अपनी गतिविधियों की समीक्षा करते थे।

बांग्लादेश कनेक्शन और भड़काऊ कंटेंट

​नेटवर्क का विस्तार सीमा पार तक था। आरोपी इकराम अली की मां मूल रूप से बांग्लादेश की रहने वाली है, जिसके जरिए शावेज का संपर्क बांग्लादेश के जुबेर नामक युवक से हुआ। जुबेर उसे कथित अत्याचारों से जुड़े भड़काऊ फोटो और वीडियो भेजता था ताकि युवाओं का ब्रेनवॉश किया जा सके।

​पुलिस अब सभी आरोपियों के बैंक खातों और उनकी फंडिंग के स्रोतों की बारीकी से जांच कर रही है। यह मामला स्पष्ट करता है कि आतंकी संगठन अब पारंपरिक हथियारों के साथ-साथ डिजिटल तकनीक और कानूनी विशेषज्ञों का सहारा लेकर देश की सुरक्षा में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं।

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