Mohsina Kidwai Death: नहीं रहीं दिग्गज कांग्रेस नेता मोहसिना किदवई; गांधी परिवार की थीं बेहद करीबी, बाराबंकी में शोक की लहर
नई दिल्ली/लखनऊ। भारतीय राजनीति की एक सशक्त आवाज और कांग्रेस की वरिष्ठतम नेताओं में शुमार मोहसिना किदवई का 94 वर्ष की आयु में दिल्ली में निधन हो गया है। उनके निधन की खबर से देश के राजनीतिक गलियारों, विशेषकर उत्तर प्रदेश के बाराबंकी और मेरठ में शोक की लहर दौड़ गई है। मोहसिना किदवई केवल एक राजनेता नहीं थीं, बल्कि वह गांधी परिवार की तीन पीढ़ियों की विश्वसनीय सलाहकार और करीबी सदस्य मानी जाती थीं।
बाराबंकी से था गहरा और अटूट रिश्ता
1 जनवरी 1932 को जन्मीं मोहसिना किदवई का जन्मस्थान बाराबंकी ही था। बाराबंकी के मसौली क्षेत्र में उनका ननिहाल और ससुराल दोनों थे। राजनीति की बुलंदियों पर पहुँचने के बावजूद वह अपनी जड़ों को कभी नहीं भूलीं और अक्सर अपने पैतृक निवास बाराबंकी आती-जाती रहती थीं। उनके निधन पर जिले के स्थानीय नेताओं और आम जनता ने गहरा दुख व्यक्त किया है।
संसदीय सफर: मेरठ से राज्यसभा तक
मोहसिना किदवई का राजनीतिक करियर बेहद शानदार रहा। उन्होंने न केवल चुनावी राजनीति में अपनी ताकत दिखाई, बल्कि राज्यसभा में भी लंबे समय तक नेतृत्व किया:
- लोकसभा: वह 1978 के ऐतिहासिक उपचुनाव, 1980 और 1984 में उत्तर प्रदेश के मेरठ निर्वाचन क्षेत्र से सांसद चुनी गईं।
- राज्यसभा: वह छत्तीसगढ़ से दो बार राज्यसभा सदस्य रहीं। उनका कार्यकाल 2004 से 2010 और फिर 2010 से 2016 तक रहा।
गांधी परिवार की विश्वसनीय और कैबिनेट मंत्री
इंदिरा गांधी के दौर में जब कांग्रेस कठिन दौर से गुजर रही थी, तब मोहसिना किदवई चट्टान की तरह उनके साथ खड़ी रहीं। इसी वफादारी और प्रशासनिक कुशलता के कारण उन्होंने इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की सरकारों में कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों का कार्यभार संभाला:
- स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय
- शहरी विकास मंत्रालय
- पर्यटन और परिवहन मंत्रालय
- ग्रामीण विकास मंत्रालय
सोनिया गांधी के दौर में भी वह कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) की महत्वपूर्ण सदस्य रहीं और पार्टी के नीतिगत निर्णयों में उनकी अहम भूमिका रही।
राजनीतिक जगत ने दी श्रद्धांजलि
मोहसिना किदवई के निधन पर उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी और देश के दिग्गज नेताओं ने शोक व्यक्त किया है। नेताओं का कहना है कि उनके जाने से भारतीय राजनीति के एक युग का अंत हो गया है। वह गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल थीं और उन्होंने हमेशा समावेशी राजनीति की पैरवी की।