25 दिन, 25 कहानियां: बनारस का वो ‘उधार’ जिसे चुकाने सात समंदर पार से आया एक वैज्ञानिक
वाराणसी: काशी के बारे में कहा जाता है कि यहाँ की गलियों में सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि आत्मीयता और ईमानदारी भी बसती है। बनारस की मशहूर ‘पहलवान लस्सी’ (लंका) के संचालक मनोज कुमार यादव ने एक ऐसा किस्सा साझा किया है, जो बताता है कि क्यों यह शहर पूरी दुनिया से अलग है। यह कहानी एक ऐसे छात्र की है जिसने 30 साल पहले 20 आने की लस्सी उधार पी थी और उसे चुकाने के लिए 20 हजार रुपये भेंट किए।
20 आने का कर्ज और 30 साल का इंतजार
मनोज कुमार यादव बताते हैं कि साल 2000 के बाद बीएचयू (BHU) में एक ‘पुरा छात्र सम्मेलन’ (Alumni Meet) आयोजित हुआ था। इस सम्मेलन में अमेरिका से एक वैज्ञानिक शामिल होने आए थे। वे सीधे लंका स्थित पहलवान लस्सी की दुकान पर पहुँचे और मनोज के पिता (दुकान के संस्थापक) को खोजने लगे।
जब उन्हें पता चला कि मनोज के पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं, तो उनकी आँखें भर आईं। उन्होंने भावुक होकर बताया:
”जब मैं बीएचयू में पढ़ता था, तब यहाँ लस्सी पीने आया था, लेकिन पास में पैसे नहीं थे। मैंने आपके पिता से कहा था कि मनी ऑर्डर आते ही 20 आने चुका दूँगा। मनी ऑर्डर आया, लेकिन व्यस्तता में मैं पैसे देना भूल गया। फिर दिल्ली और वहां से अमेरिका चला गया। आज जब 30 साल बाद मौका मिला है, तो मैं वो कर्ज उतारने आया हूँ।”
हैरानी की बात यह है कि उस वैज्ञानिक ने सिर्फ याद ही नहीं रखा, बल्कि कोविड काल के दौरान जब दुकानें बंद थीं, तब उन्होंने 20 हजार रुपये का पार्सल भेजकर उस पुराने कर्ज और प्रेम का सम्मान किया।
”सूरज, गंगा और कचौड़ी”: बनारसी फक्कड़पन का दौर
मनोज यादव पुराने दौर को याद करते हुए कहते हैं कि तब बनारस भविष्य की चिंता में नहीं जीता था। सुबह गंगा स्नान, बाबा का ध्यान और कचौड़ी छान—बस यही तीन काम बनारसियों को सुकून देते थे। तब आज के ‘जेन-जी’ (Gen Z) की तरह पिज्जा-बर्गर का चलन नहीं था, बल्कि लोग रात को मलाई-रबड़ी खाकर ही सोते थे।
अखाड़ों की संस्कृति और लस्सी का स्वाद
उस दौर में लस्सी सिर्फ एक पेय नहीं, बल्कि पहलवानों की ताकत का राज थी। अखाड़ों में शर्त लगती थी— “एक झुकी में 500 दंड मार देबा त एक पाव मलाई खियाईब…”।
तुलसी घाट का स्वामीनाथ अखाड़ा हो या गया सेठ का अखाड़ा, पहलवान यहाँ से लस्सी-रबड़ी पीकर ही निकलते थे।
तब लस्सी हर ग्राहक के लिए अलग से मथी जाती थी, जैसे आज की स्पेशल चाय बनती है।
बदलता बनारस: पिज्जा बनाम रबड़ी
आज के दौर और पुराने दौर की तुलना करते हुए मनोज कहते हैं कि अब बनारस में बाहरी पर्यटकों की भीड़ ज्यादा है। पहले बीएचयू के छात्र और स्थानीय फक्कड़ घंटों दुकान पर बैठकर साहित्य और शेरो-शायरी की बातें करते थे। आज का युवा आकर पूछता है कि ‘मलाई-रबड़ी’ क्या होती है, क्योंकि उसका रुझान फास्ट फूड की तरफ ज्यादा है।
निष्कर्ष
पहलवान लस्सी का यह किस्सा सिर्फ पैसों के लेन-देन का नहीं, बल्कि काशी की उस थाती का है जहाँ इंसानियत और जुबान की कीमत सबसे ऊपर रखी जाती है। 20 आने से 20 हजार तक का यह सफर बनारस के प्रति उस छात्र (अब वैज्ञानिक) के अटूट जुड़ाव की गवाही देता है।