अयोध्या

अयोध्या बनेगी रामायण पांडुलिपियों का वैश्विक केंद्र: प्रधानमंत्री संग्रहालय ने देश भर से मांगी दुर्लभ प्रतियां

अयोध्या अब न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि यह जल्द ही दुनिया भर की प्राचीन रामायण पांडुलिपियों (Manuscripts) का सबसे बड़ा राष्ट्रीय भंडार बनने जा रहा है। संस्कृति मंत्रालय और प्रधानमंत्री संग्रहालय की इस साझा पहल से अयोध्या को रामायण परंपरा के वैश्विक अध्ययन और अनुसंधान (Research) के मुख्य केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा।

पांडुलिपियों के संरक्षण की महा-योजना

​देश के विभिन्न कोनों में बिखरी हुई रामायण की दुर्लभ कड़ियों को एक सूत्र में पिरोने के लिए ‘राष्ट्रीय भंडार’ स्थापित करने की योजना बनाई गई है। इसके तहत प्रधानमंत्री संग्रहालय ने विद्वानों, संस्थानों और आम नागरिकों से उनके पास सुरक्षित प्राचीन रामायण पांडुलिपियों की जानकारी साझा करने का औपचारिक निमंत्रण दिया है।

​राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और अंतरराष्ट्रीय रामकथा संग्रहालय के निदेशक डॉ. संजीव सिंह के विशेष आग्रह पर केंद्र सरकार ने इन धरोहरों को अयोध्या में ही संरक्षित करने पर सहमति दी है। अब इनका संकलन और वैज्ञानिक संरक्षण अयोध्या स्थित अंतरराष्ट्रीय रामकथा संग्रहालय में किया जाएगा।

किन लिपियों और भाषाओं को दी जाएगी प्राथमिकता?

​संस्कृति मंत्रालय के अनुसार, केवल संस्कृत ही नहीं, बल्कि विभिन्न भारतीय भाषाओं और क्षेत्रीय लिपियों में लिखित रामायणों को आमंत्रित किया गया है। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:

  • प्राचीन लिपियाँ: ब्राह्मी, शारदा, नंदीनागरी, ग्रंथा और मोदी लिपि।
  • क्षेत्रीय लिपियाँ: देवनागरी, बंगाली, ओड़िया, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, तमिल और गुजराती।
  • स्वरूप: ताड़पत्र (Palm leaves) या प्राचीन कागजों पर लिखी गई सचित्र पांडुलिपियां, वाल्मीकि रामायण के विभिन्न संस्करण, टीकाएं और उप-टीकाएं।

पांडुलिपि जमा करने की प्रक्रिया

​यदि आपके पास या आपकी संस्था के पास रामायण की कोई प्राचीन प्रति है, तो आप निम्नलिखित विवरणों के साथ अंतरराष्ट्रीय रामकथा संग्रहालय, अयोध्या से संपर्क कर सकते हैं:

  1. ​पांडुलिपि का शीर्षक और अनुमानित आयु।
  2. ​प्रयुक्त लिपि और भौतिक स्वरूप (कागज/ताड़पत्र)।
  3. ​पृष्ठों (फोलियो) की संख्या और आकार।
  4. ​प्रथम और अंतिम पृष्ठ की रंगीन फोटो या वीडियो नमूना।

विशेषज्ञ समिति करेगी जांच

​सूचना प्रसारित होने के साथ ही देशभर से आवेदन आने शुरू हो गए हैं। प्राप्त होने वाली सामग्री की प्रामाणिकता और ऐतिहासिक महत्व की जांच के लिए पांच सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति का गठन किया गया है। इस समिति में केंद्रीय सांस्कृतिक विश्वविद्यालय के कुलपति, राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के प्रबंधक और पांडुलिपि विशेषज्ञ प्रोफेसर शामिल हैं।

निष्कर्ष

​इस पहल का मुख्य उद्देश्य रामायण की ‘कालातीत विरासत’ को डिजिटल और भौतिक रूप से सुरक्षित करना है ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी रह सकें। अयोध्या का यह संग्रहालय भविष्य में शोधार्थियों के लिए ज्ञान का महासागर साबित होगा।

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