वाराणसी

UP: “काशी इतिहास से भी पुरानी है”, पर क्या जेन-जी (Gen Z) समझती है इसकी गहराई? जानें बनारस का अनकहा सच

​वाराणसी। मार्क ट्वेन ने कभी कहा था, “काशी इतिहास से भी पुरानी है, परंपराओं से भी पुरानी है, किंवदंतियों से भी पुरानी है और इन सबको एक साथ मिला दिया जाए तो उससे भी दोगुनी पुरानी है।” आज की नई पीढ़ी यानी ‘जेन-जी’ (Gen Z) के लिए यह जुमला सोशल मीडिया कैप्शन तक ही सीमित रह गया है। लेकिन क्या वास्तव में हम उस काशी को जानते हैं जिसने सदियों से दुनिया को विद्वता और सौहार्द का पाठ पढ़ाया?
​हाल ही में काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के पूर्व विशेष कार्याधिकारी डॉ. विश्वनाथ पांडेय ने शहर के बदलते स्वरूप और खोती जा रही बौद्धिक चेतना पर गंभीर विचार साझा किए।
​बीएचयू: डिग्री बांटने की मशीन या व्यक्तित्व निर्माण का केंद्र?
​डॉ. पांडेय के अनुसार, काशी के पुरुषार्थ की सबसे बड़ी पहचान काशी हिंदू विश्वविद्यालय है। महामना मदन मोहन मालवीय ने इस बगिया को सत्य, ब्रह्मचर्य, देशभक्ति और आत्मत्याग के मूल्यों पर सींचा था।
​25 साल पहले का स्वर्ण युग: तीन दशक पहले बीएचयू कैंपस केवल प्रवेश और परीक्षा का केंद्र नहीं था, बल्कि यहाँ व्यक्तित्व निर्माण होता था।
​आज की स्थिति: अब विश्वविद्यालय प्रकाशन ठप हैं, मेमोरियल लेक्चर (Memorial Lectures) इतिहास का हिस्सा बन चुके हैं और ‘बीएचयू कोर्ट’ जैसी संस्थाएं अस्तित्वहीन होती जा रही हैं। डॉ. पांडेय कहते हैं कि आज का कैंपस 25 साल पहले के उस ‘स्वर्ण युग’ की तुलना में केवल एक व्यवस्था मात्र बनकर रह गया है।
​”इतिहास से पुरानी” – सिर्फ एक टैगलाइन?
​आज की युवा पीढ़ी (Gen Z) काशी के वैभव को इंस्टाग्राम रील्स और “इतिहास से पुरानी” जैसी पंक्तियों में समेट रही है। जबकि इसी काशी की बौद्धिक धारा को जीवित रखने के लिए दुनिया भर के विद्वानों ने धर्म, इतिहास और दर्शन पर सैकड़ों पुस्तकें लिखीं।
डॉ. पांडेय का मानना है कि जो सामर्थ्यवान हैं, वे आत्म-प्रशंसा और संपत्ति वृद्धि में डूबे हैं। जो आवाज़ उठाते हैं, वे अक्सर व्यक्तिगत लाभ तलाशने लगते हैं। ऐसे में काशी का वह ‘विद्वत समाज’ कहीं गुम होता दिख रहा है जिसने कभी दुनिया का मार्गदर्शन किया था।
​जब सड़कों पर उतर आए थे कुलपति: सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल
​काशी के इतिहास का एक गौरवशाली पक्ष उसकी ‘सांप्रदायिक शून्यता’ रही है। डॉ. पांडेय एक ऐतिहासिक घटना को याद करते हुए बताते हैं कि तीन दशक पहले जब शहर में सांप्रदायिक तनाव की आहट हुई, तो काशी का बौद्धिक वर्ग चुप नहीं बैठा।
​”तत्कालीन कुलपति से लेकर हजारों प्रोफेसर और छात्र मालवीय भवन से टाउनहॉल तक पदयात्रा पर निकल पड़े थे। वे धरने पर बैठे और अपनी एकजुटता से नफरत को शहर की सीमाओं से बाहर खदेड़ दिया।”
​आज वह सामाजिक चेतना और एकजुटता कहीं न कहीं फीकी पड़ती दिख रही है।
​चुनौती: विकास और विरासत के बीच संतुलन
​तेजी से भागती तकनीक, बढ़ता अर्थतंत्र और बदलता परिवेश निश्चित रूप से परंपराओं को प्रभावित करेगा। पुराने काशीवासी शहर के बदलते रहन-सहन और दिनचर्या को लेकर चिंतित जरूर हैं, लेकिन बदलाव प्रकृति का नियम है।
​असली चुनौती यह है कि हम स्मार्ट सिटी बनने की रेस में ‘सांस्कृतिक काशी’ को पीछे न छोड़ दें। विकास जरूरी है, लेकिन वह विरासत की कीमत पर नहीं होना चाहिए। डॉ. पांडेय की यह अपील उन लोगों के लिए एक आईना है जो काशी को केवल एक पर्यटन स्थल मानते हैं, न कि एक जीवंत चेतना।
​निष्कर्ष: काशी केवल पत्थरों और घाटों का शहर नहीं है, यह एक विचार है। यदि नई पीढ़ी को वास्तव में काशी को “इतिहास से पुराना” साबित करना है, तो उन्हें इसके साहित्य, विद्वता और सामाजिक समरसता को फिर से आत्मसात करना होगा।

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