लखनऊ

​Suna Hai Kya: यूपी के अफसरों की ‘कानाफूसी’; कोई जून के इंतजार में बैठा है, तो कोई उधेड़ रहा एक-दूसरे की बखिया

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी के गलियारों और सरकारी दफ्तरों में इन दिनों काम से ज्यादा ‘कारनामों’ की चर्चा है। कहीं कुर्सी बचाने की जुगत है, तो कहीं जून की गर्मी से पहले तबादलों की गर्माहट महसूस की जा रही है। शिक्षा से लेकर उद्योग विभाग तक, हर तरफ अफसरों के बीच एक अजीब सी बेचैनी और प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है।

​पेश है लखनऊ ब्यूरो की ताजा ‘कानाफूसी’:

1. शिक्षा विभाग: “अभी समय सही नहीं चल रहा साहब!”

​प्रदेश के शिक्षा विभाग (पढ़ाई-लिखाई वाले विभाग) के तीसरे तल पर इन दिनों सन्नाटा तो है, पर बेचैनी भारी है। यहाँ के साहबों की नजरें कैलेंडर पर टिकी हैं—सबको बस जून का इंतजार है।

  • वजह: कुछ अधिकारी रिटायर होने की तैयारी में हैं, तो कुछ को डर है कि तबादलों की एक्सप्रेस उन्हें कहीं दूर न फेंक दे।
  • मजेदार बात: हाल ही में एक काबिल अफसर को ऊंचे पद का ऑफर मिला, तो उन्होंने साफ कह दिया— “वहां का समय अभी खराब चल रहा है, पहले हालात सुधरने दें, फिर आएंगे।” यानी कुर्सी खाली है, पर कांटों भरी!

2. आयुर्वेद विभाग: जड़ी-बूटी वाले साहब की ‘सुपरफास्ट’ सक्रियता

​राजधानी में आयुर्वेद विभाग के एक नए साहब आए हैं, जिनकी तेजी ने पूरे दफ्तर का ‘हाजमा’ बिगाड़ दिया है। साहब अक्सर नदारद रहते हैं, लेकिन जिस दिन आते हैं, उस दिन तूफान ला देते हैं।

  • ताजा किस्सा: 15 अप्रैल की दोपहर एक बजे उन्होंने पत्र जारी किया और शाम 5 बजे तक तबादलों की पूरी जानकारी मांग ली।
  • चर्चा क्या है: गलियारों में शोर है कि साहब अभी से तबादला सूची की ‘सेटिंग’ में जुट गए हैं। अस्पताल के हिसाब से ‘रेट’ तय होने की भी खबरें तैर रही हैं। अब देखना ये है कि ये ‘नुस्खा’ काम आता है या फाइलें ठंडी पड़ती हैं।

3. उद्योगों का विकास या ‘मूंछ की लड़ाई’?

​यूपी के पूरब से पश्चिम तक फैले औद्योगिक प्राधिकरणों में इन दिनों ‘धन्नासेठों’ (निवेशकों) को लाने की होड़ मची है। लेकिन यह होड़ विकास से ज्यादा व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा बन गई है। विशेषकर तीन बड़े प्राधिकरणों के बीच “उसकी कमीज मेरी कमीज से सफेद कैसे” वाली जंग छिड़ी है।

  • हालत यह है: अधिकारी यह बताने में कम समय लगा रहे हैं कि उन्होंने कितनी फैक्ट्रियां लगवाईं, बल्कि इस बात में ज्यादा पसीना बहा रहे हैं कि दूसरे वाले ने कितनी गलतियां कीं। एक-दूसरे की ‘बखिया उधेड़ने’ का यह खेल लखनऊ के पावर कॉरिडोर में चर्चा का विषय बना हुआ है।
विभागक्या चर्चा है?मौजूदा स्थिति
शिक्षा विभागजून का इंतजारअधिकारी पद लेने से कतरा रहे हैं।
आयुर्वेद विभागतबादलों की तैयारी‘रेट लिस्ट’ और ‘तेजी’ की चर्चा जोरों पर।
उद्योग प्राधिकरणआपसी प्रतिस्पर्धाविकास से ज्यादा एक-दूसरे की कमियां खोजने पर जोर।

निष्कर्ष

​यूपी की ब्यूरोक्रेसी में जून का महीना हमेशा से ‘तबादलों का महीना’ रहा है, लेकिन इस बार अप्रैल से ही जिस तरह की बिसात बिछाई जा रही है, उसने माहौल को दिलचस्प बना दिया है। अब देखना यह है कि जून आने तक कितने साहब अपनी कुर्सियां बचा पाते हैं और कितनों का ‘वनवास’ शुरू होता है।

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