लखनऊ

सुना है क्या: यूपी में ‘बदलाव की धुकधुकी’ और ‘साहब’ की बेचैनी; पढ़ें सत्ता के गलियारों के चटपटे किस्से

उत्तर प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक गलियारे कभी शांत नहीं रहते। यहाँ दीवारों के भी कान होते हैं और फाइलों के बीच दबी खबरें अक्सर चाय की चुस्कियों के साथ बाहर आ ही जाती हैं। हालिया चर्चा मंत्रिमंडल विस्तार और नौकरशाही में हुए फेरबदल को लेकर है। पेश हैं “सुना है क्या” सीरीज के कुछ ऐसे किस्से, जो इस वक्त लखनऊ के पावर सेंटर में चर्चा का विषय बने हुए हैं।
​1. बदलाव को लेकर धुकधुकी: जब माननीयों ने ओढ़ ली चुप्पी
​यूपी में संभावित मंत्रिमंडल विस्तार की खबरों ने कई मंत्रियों की रातों की नींद उड़ा दी है। गलियारों में चर्चा है कि इस बार केवल नए चेहरे शामिल नहीं होंगे, बल्कि पुराने चेहरों के विभागों में ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ भी हो सकती है। यानी प्रमोशन और डिमोशन का खेल तय माना जा रहा है।
​सबसे दिलचस्प हाल उन तीन माननीयों का है, जिनका रिपोर्ट कार्ड थोड़ा कमजोर बताया जा रहा है। खबर है कि ये माननीय आजकल मीडिया और विवादित बयानों से कोसों दूर हैं। इन्होंने खुद को एक तरह के ‘राजनैतिक कल्पवास’ में डाल लिया है। हाल बिल्कुल उस छात्र जैसा है, जो परीक्षा परिणाम आने से पहले अचानक बहुत पूजा-पाठ और आध्यात्मिक हो जाता है। सबको डर है कि कहीं ‘परफॉरमेंस’ के आधार पर कुर्सी खिसक न जाए।
​2. माननीय से ज्यादा ‘साहब’ बेचैन: ये कैसा प्रेम?
​आमतौर पर मंत्रिमंडल विस्तार से नेता घबराते हैं, लेकिन इस बार मामला उल्टा है। लखनऊ के एक ‘पढ़ाई-लिखाई’ वाले विभाग के बड़े अफसर (साहब) अपने मंत्री जी से ज्यादा परेशान नजर आ रहे हैं।
​किस्सा यह है कि साहब की अपनी कुछ व्यक्तिगत और विभागीय ‘महत्वाकांक्षाएं’ हैं, जिन्हें पूरा करने के लिए उन्होंने जमीन तैयार कर ली थी। अब उन्हें डर सता रहा है कि अगर उनके विभाग के माननीय का तबादला हो गया या वे मंत्रिमंडल से बाहर हो गए, तो साहब के उन ‘खास प्रोजेक्ट्स’ का क्या होगा? इसी डर के मारे साहब आजकल सचिवालय के चक्कर काट रहे हैं कि किसी तरह पुराने माननीय की कुर्सी बची रहे।
​3. कलेक्टरी की कसक: जब कलम से निकला दर्द
​हाल ही में हुए आईएएस (IAS) तबादलों ने कई अधिकारियों के समीकरण बिगाड़ दिए हैं। सबसे ज्यादा चर्चा पूर्वांचल के एक जिले से हटाए गए ‘कलेक्टर साहब’ की हो रही है। जिले की कमान संभालते वक्त साहब का जलवा अलग था, लेकिन अब उन्हें एक शांत विभाग में भेज दिया गया है।
​कलेक्टरी छिनने का दर्द अब साहब की सोशल मीडिया पोस्ट्स में ‘कविता’ बनकर छलक रहा है। उनकी नई पोस्ट में लिखा है— “लक्ष्य की प्राप्ति तक नहीं रुकूंगा।” अब देखने वाली बात यह है कि क्या साहब का लक्ष्य वापस किसी जिले की कमान पाना है या फिर वे वाकई साहित्य की दुनिया में बड़ा नाम करना चाहते हैं। प्रशासनिक हलकों में लोग इस ‘काव्यात्मक विदाई’ पर चटखारे ले रहे हैं।
​निष्कर्ष: सत्ता की ये कानाफूसी बहुत कुछ कहती है
​उत्तर प्रदेश की राजनीति में ये किस्से केवल मनोरंजन नहीं हैं, बल्कि आने वाले बड़े बदलावों का संकेत हैं। जब राजनेता ‘अध्यात्म’ की शरण में चले जाएं और अफसर ‘कवि’ बन जाएं, तो समझ लीजिए कि लखनऊ की हवाओं में कुछ बड़ा पक रहा है।

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