वाराणसी

अक्षय तृतीया पर काशी में रचने जा रहा इतिहास: 8 राज्यों के 1100 बटुकों का होगा सामूहिक उपनयन संस्कार

वाराणसी। धर्म और अध्यात्म की नगरी काशी एक बार फिर एक भव्य आयोजन की साक्षी बनने जा रही है। इस वर्ष अक्षय तृतीया (20 अप्रैल, 2026) के पावन पर्व पर दुर्गाकुंड स्थित धर्म सम्राट स्वामी करपात्री महाराज की तपोस्थली, धर्मसंघ शिक्षा मंडल में 1100 बटुकों का सामूहिक यज्ञोपवीत (उपनयन) संस्कार संपन्न होगा।

​यह आयोजन न केवल विशाल स्तर पर हो रहा है, बल्कि यह सनातन परंपराओं के पुनर्जागरण का भी प्रतीक है।

100 से अधिक यज्ञ वेदियों पर गूंजेंगे वैदिक मंत्र

​आयोजन की भव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि परिसर में 100 से अधिक यज्ञ वेदियां तैयार की जा रही हैं। धर्मसंघ के महामंत्री पं. जगजीतन पांडेय के अनुसार, धर्मसंघ पीठाधीश्वर स्वामी शंकरदेव चैतन्य ब्रह्मचारी महाराज के सानिध्य में यह अनुष्ठान होगा। 20 अप्रैल की सुबह 7 बजे से वैदिक विद्वानों द्वारा शास्त्रोक्त विधि-विधान से बटुकों को जनेऊ धारण कराया जाएगा।

8 राज्यों से जुटेंगे बटुक: एक नजर आंकड़ों पर

​इस बार का आयोजन पिछले वर्षों की तुलना में कहीं अधिक व्यापक है। इसमें उत्तर प्रदेश के अलावा सात अन्य राज्यों के बटुक हिस्सा लेंगे:

क्षेत्र/राज्यभागीदारी (अनुमानित)
यूपी, बिहार, झारखंड50%
दिल्ली, राजस्थान, MP, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड50

कुल 1100 बटुकों की यह संख्या अब तक के सबसे बड़े सामूहिक उपनयन संस्कारों में से एक मानी जा रही है।

शास्त्रीय संगीत का नया अध्याय

​धर्मसंघ केवल धार्मिक अनुष्ठान तक ही सीमित नहीं रह रहा है, बल्कि अब यहाँ वेद और विद्या का संगम देखने को मिलेगा। अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर ही वेदपाठी बटुकों के लिए शास्त्रीय संगीत प्रशिक्षण की भी शुरुआत की जाएगी।

  • प्रशिक्षक: पं. शिवनाथ मिश्र संगीत अकादमी के विशेषज्ञ।
  • विषय: गायन, तबला और हारमोनियम।
  • भविष्य की योजना: बटुकों को सितार और बांसुरी जैसे वाद्ययंत्र बजाने में भी निपुण बनाया जाएगा, ताकि वे वैदिक ऋचाओं के साथ संगीत की कला में भी पारंगत हो सकें।

यज्ञोपवीत संस्कार का महत्व

​हिंदू धर्म के 16 संस्कारों में उपनयन संस्कार का विशेष स्थान है। इसे ‘द्वितीय जन्म’ माना जाता है, जहाँ से बालक के गुरु-शिष्य परंपरा और शिक्षा ग्रहण करने के मार्ग का आरंभ होता है। अक्षय तृतीया के दिन इस संस्कार का होना इसे और भी शुभ और अक्षय (जिसका क्षय न हो) फल देने वाला बनाता है।

तैयारियां जोरों पर

​वाराणसी ब्यूरो के अनुसार, धर्मसंघ परिसर में इस समय उत्सव जैसा माहौल है। यज्ञ वेदियों के निर्माण से लेकर बाहर से आने वाले बटुकों और उनके परिजनों के ठहरने की व्यवस्था को अंतिम रूप दिया जा रहा है।

निष्कर्ष

​काशी में होने वाला यह भव्य आयोजन आधुनिक युग में सनातन संस्कारों के प्रति युवाओं और परिवारों के बढ़ते रुझान को दर्शाता है। यह न केवल काशी के गौरव को बढ़ाता है, बल्कि पूरे भारत से आए बटुकों के माध्यम से सांस्कृतिक एकता का संदेश भी देता है।

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