कानपुर

​कानपुर: अटल घाट पर उतरा देवलोक, 108 ध्रुपद गायकों और 110 बटुकों ने रचा इतिहास

कानपुर। उत्तर प्रदेश के कानपुर में भारतीय नववर्ष विक्रम संवत 2083 का स्वागत किसी उत्सव से कम नहीं रहा। गुरुवार तड़के गंगा बैराज स्थित अटल घाट का नजारा ऐसा था, मानो स्वर्ग साक्षात धरती पर उतर आया हो। कानपुर स्कूल्स वेलफेयर एसोसिएशन द्वारा आयोजित इस भव्य कार्यक्रम में संगीत, आध्यात्मिकता और संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिला।

वैदिक मंत्रोच्चारण और बटुकों का समागम

​कार्यक्रम की शुरुआत सूर्योदय से पूर्व हुई, जहाँ 110 बटुकों ने एक साथ ऊंचे स्वर में वैदिक मंत्रोच्चारण किया। केसरिया वस्त्रों में सजे इन बटुकों ने जब भगवान भास्कर (सूर्य) का आह्वान किया, तो पूरा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर गया। जैसे ही सूर्य की पहली किरण ने गंगा की लहरों को छुआ, शंखनाद और नासिक से आए पारंपरिक ढोल वाद्यों की गूंज ने पूरे क्षेत्र को गुंजायमान कर दिया।

108 ध्रुपद गायकों ने बनाया संभावित विश्व रिकॉर्ड

​इस आयोजन का सबसे बड़ा आकर्षण अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त ध्रुपद गायक पंडित विनोद कुमार द्विवेदी और आयुष द्विवेदी की प्रस्तुति रही। उन्होंने अपने 108 शिष्यों के साथ मिलकर ध्रुपद शैली में सूर्य मंत्र और विभिन्न रागों की प्रस्तुति दी।

प्रस्तुत किए गए प्रमुख राग:

  • राग अहीर भैरव: ‘नव संवत्सर मंगलमय हो’ के साथ नव वर्ष की शुभकामनाएं।
  • राग मालकौंस: ‘शंकर हर-हर’ के उद्घोष के साथ शिव स्तुति।
  • राग चारुकेशी: ‘राजा रामचंद्र’ के भजनों से भक्ति का संचार।
  • राग भैरवी: ‘माता भैरवी त्रिपुरा’ की शक्ति वंदना।
  • राग कलावती: ‘ओम नमो भगवते वासुदेवाय’ के साथ समापन।

​संगीत विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में ध्रुपद गायकों का एक साथ मंच पर आना एक नया विश्व रिकॉर्ड हो सकता है।

गंगा आरती और सूर्य अर्घ्य

​हजारों की संख्या में उमड़े कानपुर वासियों ने भक्ति भाव के साथ उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया। गंगा की लहरों के बीच दीपदान और भव्य आरती ने दृश्य को अलौकिक बना दिया। कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने एक-दूसरे को नव संवत्सर की बधाई दी और देश की सुख-समृद्धि की कामना की।

कार्यक्रम की मुख्य बातेंविवरण
स्थानअटल घाट, गंगा बैराज, कानपुर
अवसरभारतीय नववर्ष (विक्रम संवत 2083)
मुख्य कलाकारपं. विनोद कुमार द्विवेदी एवं 108 शिष्य
सहयोग110 वैदिक बटुक
आयोजककानपुर स्कूल्स वेलफेयर एसोसिएशन

सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण

​इस आयोजन का उद्देश्य नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति और काल गणना (कैलेंडर) से परिचित कराना था। आयोजकों ने बताया कि जिस तरह से पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव बढ़ रहा है, ऐसे में अपनी जड़ों से जुड़ना अनिवार्य है। ध्रुपद जैसी प्राचीन गायन शैली और बटुकों द्वारा किया गया पाठ हमारी समृद्ध विरासत का प्रतीक है।

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