कानपुर

​कानपुर गैस संकट: हेल्प डेस्क के नाम पर जनता से ‘मजाक’, शिकायतें शुरू होते ही अफसरों ने बंद किए मोबाइल

कानपुर। उत्तर प्रदेश के औद्योगिक शहर कानपुर में एलपीजी गैस की किल्लत ने त्राहि-त्राहि मचा दी है। एक तरफ जनता सिलेंडर के लिए दर-दर भटक रही है, वहीं दूसरी ओर जिला प्रशासन और पूर्ति विभाग की ‘हेल्पलाइन’ महज एक कागजी खानापूरी साबित हो रही है। गैस संकट के समाधान के लिए जारी किए गए अधिकारियों के नंबर बंद मिलने से उपभोक्ताओं का गुस्सा फूट पड़ा है।

​कतारों में खड़ी जनता और बंद पड़े फोन

​कानपुर जिले में पिछले एक सप्ताह से हालात बेहद चिंताजनक हैं। दादा नगर स्थित ममता गैस एजेंसी हो या शहर की अन्य एजेंसियां, हर जगह सुबह 4 बजे से ही लंबी कतारें लग रही हैं। आंकड़ों के मुताबिक, प्रतिदिन 20 हजार से अधिक उपभोक्ता गैस सिलेंडर के लिए घंटों लाइन में लगने को मजबूर हैं।

​जनता की इस परेशानी को देखते हुए 11 मार्च को अपर जिलाधिकारी (आपूर्ति) ने तीन शिफ्टों में विशेष टीमों का गठन किया था। आदेशानुसार, सुबह 7 बजे से रात 11 बजे तक गैस संबंधी शिकायतों के निस्तारण की जिम्मेदारी तय की गई थी। लेकिन धरातल पर सच्चाई इसके ठीक उलट निकली। जैसे ही परेशान जनता ने जारी किए गए नंबरों पर डायल करना शुरू किया, अधिकांश अधिकारियों के फोन या तो ‘स्विच्ड ऑफ’ आए या उन्हें उठाया ही नहीं गया।

​युद्ध का असर और विभाग की नाकामी

​वैश्विक स्तर पर अमेरिका, इस्राइल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध के कारण गैस आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हुई है। कानपुर में इसका असर सबसे ज्यादा दिख रहा है। पूर्ति निरीक्षक और पूर्ति लिपिक, जिन्हें जनता की मदद के लिए तैनात किया गया था, अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते नजर आ रहे हैं।

​प्रशासन द्वारा जारी किए गए:

  • कंट्रोल रूम नंबर: 0512-2988763
  • व्हाट्सएप नंबर: 6394616122

​उपभोक्ताओं का आरोप है कि ये नंबर केवल औपचारिकता बनकर रह गए हैं। व्हाट्सएप पर मैसेज का जवाब नहीं मिल रहा और कंट्रोल रूम के नंबर पर कोई ठोस सुनवाई नहीं हो रही है।

​ADM का नया पैंतरा: व्यक्तिगत बनाम कंट्रोल रूम नंबर

​शनिवार को जब शिकायतों का अंबार लगा और सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक जनता की नाराजगी बढ़ी, तो अपर जिलाधिकारी (आपूर्ति) राजेश कुमार ने एक नया स्पष्टीकरण जारी किया। उन्होंने अपने नए आदेश में कहा कि पहले जो नंबर जारी किए गए थे, वे अधिकारियों के व्यक्तिगत नंबर थे, न कि कंट्रोल रूम के।

​एडीएम ने अब निर्देश दिया है कि जनता केवल आधिकारिक कंट्रोल रूम नंबर पर ही अपनी शिकायत दर्ज कराए। हालांकि, जनता का सवाल यह है कि यदि नंबर व्यक्तिगत थे, तो उन्हें सरकारी आदेश के माध्यम से सार्वजनिक क्यों किया गया? क्या यह केवल जिम्मेदारी से बचने का एक बहाना है?

​गैस एजेंसियों की मनमानी पर लगाम नहीं

​लाइन में लगे उपभोक्ताओं का कहना है कि गैस एजेंसी संचालक अपनी मनमानी कर रहे हैं। स्टॉक होने के बावजूद ‘नो स्टॉक’ का बोर्ड लगा दिया जाता है या फिर चहेतों को चोरी-छिपे सिलेंडर बांटे जा रहे हैं। पूर्ति विभाग की टीमें इन कालाबाजारी करने वालों पर नकेल कसने में पूरी तरह विफल रही हैं।

​निष्कर्ष

​कानपुर में गैस का यह संकट केवल आपूर्ति की कमी नहीं, बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी को भी दर्शाता है। जब तक हेल्पलाइन नंबरों पर जवाबदेही तय नहीं होगी और कालाबाजारी करने वाली एजेंसियों पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक आम आदमी इसी तरह लाइनों में पिसता रहेगा।

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