सावधान लखनऊ! दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में शामिल हुई नवाबी नगरी, WHO की सीमा से 10 गुना ज्यादा जहरीली हुई हवा
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की आबोहवा अब सेहत के लिए एक बड़ा खतरा बनती जा रही है। स्विट्जरलैंड की प्रतिष्ठित एयर क्वालिटी एजेंसी आईक्यू एअर (IQAir) की साल 2026 की वैश्विक रिपोर्ट ने लखनऊ प्रशासन और निवासियों की चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, लखनऊ अब दुनिया का 58वां सबसे प्रदूषित शहर बन गया है।
WHO की गाइडलाइंस से 10 गुना खराब स्थिति
रिपोर्ट के सबसे चौंकाने वाले आंकड़े पीएम 2.5 (PM 2.5) के स्तर को लेकर हैं। लखनऊ में सालाना औसत पीएम 2.5 का स्तर 54.2 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा निर्धारित सुरक्षित सीमा से यह करीब 10 गुना अधिक है। ये सूक्ष्म कण इतने खतरनाक होते हैं कि सांस के जरिए सीधे फेफड़ों और रक्तप्रवाह में प्रवेश कर जाते हैं, जिससे गंभीर बीमारियां हो सकती हैं।
यूपी के 11 शहर रेड जोन में
इस वैश्विक सूची में केवल लखनऊ ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के कुल 11 शहर शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक:
- लोनी (गाजियाबाद): दुनिया का सबसे प्रदूषित स्थान।
- दिल्ली और चीन का होतान: क्रमशः दूसरे और तीसरे स्थान पर।
- भारत की रैंकिंग: वैश्विक स्तर पर भारत प्रदूषित देशों की सूची में 7वें स्थान पर है।
क्यों जहरीली हो रही है लखनऊ की हवा?
वरिष्ठ वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने लखनऊ में बढ़ते प्रदूषण के पीछे चार प्रमुख कारण बताए हैं:
- वाहनों का धुआं: सड़कों पर बढ़ती गाड़ियों की संख्या और पुराने वाहनों से निकलने वाला उत्सर्जन।
- निर्माण कार्य: शहर में जगह-जगह चल रहे अनियंत्रित निर्माण कार्य और उड़ती धूल।
- कचरा प्रबंधन: कचरे को खुले में जलाना और धूल भरी सड़कें।
- औद्योगिक उत्सर्जन: आसपास के क्षेत्रों में स्थित फैक्ट्रियों से निकलने वाला धुआं।
सेहत पर पड़ रहा है बुरा असर
डॉक्टरों का कहना है कि पीएम 2.5 का बढ़ा हुआ स्तर अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, दिल का दौरा, स्ट्रोक और फेफड़ों के कैंसर के खतरे को कई गुना बढ़ा देता है। विशेषकर बच्चों, बुजुर्गों और पहले से सांस की बीमारी झेल रहे लोगों के लिए यह स्थिति “स्लो पॉइजन” (धीमे जहर) की तरह काम कर रही है।
बचाव के उपाय और समाधान
विशेषज्ञों के अनुसार, स्थिति को सुधारने के लिए कड़े कदम उठाने की जरूरत है:
- सड़कों की नियमित मैकेनाइज्ड सफाई और पानी का छिड़काव।
- सार्वजनिक परिवहन (जैसे लखनऊ मेट्रो और इलेक्ट्रिक बसें) का अधिक उपयोग।
- निर्माण स्थलों पर डस्ट कंट्रोल नियमों का सख्ती से पालन।
- पुराने और अधिक धुआं छोड़ने वाले वाहनों पर प्रतिबंध।