लखनऊ: 55 डॉक्टरों की भर्ती के लिए महज 100 सेकंड का इंटरव्यू, अभ्यर्थियों ने लगाए धांधली के गंभीर आरोप:-
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में स्वास्थ्य विभाग की एक भर्ती प्रक्रिया विवादों के घेरे में आ गई है। मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) कार्यालय द्वारा आयोजित संविदा एमबीबीएस डॉक्टरों के ‘वॉक-इन इंटरव्यू’ में पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। अभ्यर्थियों का आरोप है कि चयन प्रक्रिया के नाम पर केवल खानापूर्ति की गई और पूरी प्रक्रिया में नियमों को ताक पर रखकर चहेतों को फायदा पहुँचाया गया।
क्या है पूरा मामला?
राजधानी में मोहल्ला क्लीनिक की तर्ज पर शुरू किए गए ‘हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर्स’ के लिए संविदा पर 55 एमबीबीएस डॉक्टरों की भर्ती निकाली गई थी। बीते 7 जनवरी को सीएमओ कार्यालय में इसके लिए वॉक-इन इंटरव्यू का आयोजन हुआ। रिक्त पदों की संख्या 55 थी, जबकि इंटरव्यू देने के लिए लगभग 350 डॉक्टर पहुँचे थे। विवाद तब शुरू हुआ जब चयन प्रक्रिया की समय सीमा और साक्षात्कार के तरीके पर उंगलियाँ उठने लगीं।
गणित जो संदेह पैदा करता है
अभ्यर्थियों ने इंटरव्यू के समय की जो गणना साझा की है, वह चौंकाने वाली है। इंटरव्यू सुबह 11 बजे शुरू हुआ और शाम 7 बजे समाप्त हुआ।
- कुल समय: 8 घंटे (480 मिनट)
- कुल अभ्यर्थी: 350
- औसत समय: प्रति अभ्यर्थी लगभग 1 मिनट 37 सेकंड
डॉक्टरों का कहना है कि इतने कम समय में किसी भी पेशेवर की योग्यता का आकलन करना असंभव है। एक अभ्यर्थी को कमरे में प्रवेश करने और कुर्सी पर बैठने में ही 30-40 सेकंड लग जाते हैं। ऐसे में पैनल के पास सवाल पूछने के लिए एक मिनट से भी कम का समय बचा, जो चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवालिया निशान लगाता है।
EWS कोटे और अपात्रों के चयन का आरोप
इंटरव्यू में शामिल हुए डॉक्टरों ने एक और गंभीर आरोप लगाया है। उनका कहना है कि निजी मेडिकल कॉलेजों और विदेशों से करोड़ों रुपये खर्च कर एमबीबीएस की डिग्री लेने वाले कई उम्मीदवारों को विभाग के ही कुछ कर्मचारियों ने ‘आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग’ (EWS) का प्रमाण पत्र बनवाने की सलाह दी थी। आरोप है कि इस कोटे का दुरुपयोग कर कई अपात्र लोगों ने नियुक्तियां हासिल कर ली हैं, जबकि योग्य और जरूरतमंद उम्मीदवार बाहर रह गए।
अभ्यर्थियों का दर्द: “सिर्फ खानापूर्ति हुई”
नाम न छापने की शर्त पर एक महिला डॉक्टर ने बताया, “मुझसे करीब चार मिनट बात की गई, मैंने सभी सवालों के सही जवाब दिए, फिर भी मेरा चयन नहीं हुआ। वहीं, मेरे कई सीनियर डॉक्टरों को महज एक से डेढ़ मिनट में बाहर भेज दिया गया। ऐसा लगा जैसे लिस्ट पहले से ही तैयार थी और हमें बस औपचारिकता के लिए बुलाया गया था।”
साक्षात्कार सीएमओ कार्यालय के तीसरे तल पर स्थित सभागार में हुआ था, जहाँ बैठने की सीमित व्यवस्था होने के कारण डॉक्टर घंटों गलियारों में खड़े रहे। अभ्यर्थियों ने अब इस मामले की शिकायत उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री (स्वास्थ्य मंत्री) से करने का निर्णय लिया है।
सीएमओ का पक्ष
इन तमाम आरोपों पर सीएमओ डॉ. एनबी सिंह ने सफाई दी है। उन्होंने आरोपों को पूरी तरह निराधार और बेबुनियाद बताया है। डॉ. सिंह का कहना है कि चयन समिति ने पूरी पारदर्शिता और निष्पक्षता के साथ साक्षात्कार लिए हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई लिखित शिकायत प्राप्त होती है, तो नियमानुसार मामले की जांच कराई जाएगी।
निष्कर्ष
स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील विभाग में डॉक्टरों की भर्ती प्रक्रिया पर उठते सवाल प्रशासन की कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। यदि डेढ़ मिनट में भविष्य के डॉक्टरों का चयन होगा, तो स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर इसका क्या असर पड़ेगा, यह एक बड़ा सवाल है।