इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंची मुरादाबाद की बेटी: कहा- ‘पापा सिविल सेवा की तैयारी नहीं करने दे रहे’, पिता ने लगाया सहेली पर गंभीर आरोप
प्रयागराज। भारत में जहाँ ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा बुलंद किया जाता है, वहीं उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने पारिवारिक बंधनों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बहस को कोर्ट की दहलीज तक पहुँचा दिया है। एक युवती ने अपने ही पिता के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। युवती का आरोप है कि वह सिविल सेवा (UPSC) की तैयारी करना चाहती है, लेकिन उसके पिता इसमें बाधक बन रहे हैं और उसे गलत राह पर बता रहे हैं।
क्या है पूरा मामला?
मामला मुरादाबाद के छजलैट थाना क्षेत्र का है। एक युवती, जो वर्तमान में अपनी एक सहेली के साथ रह रही है, ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर सुरक्षा की मांग की है। युवती का कहना है कि वह बालिग है और अपनी मर्जी से जीवन जीने तथा शिक्षा प्राप्त करने का संवैधानिक अधिकार रखती है।
याचिका के अनुसार, युवती सिविल सेवा परीक्षा जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करना चाहती है। इसके लिए उसकी सहेली उसे आर्थिक मदद भी मुहैया करा रही है। लेकिन उसके पिता और अन्य रिश्तेदार इस फैसले के सख्त खिलाफ हैं। युवती का दावा है कि उसे पढ़ाई छोड़कर घर लौटने के लिए मजबूर किया जा रहा है, जिससे उसकी सुरक्षा को खतरा है।
पिता के सनसनीखेज दावे: ‘बेटी को गुमराह किया गया’
दूसरी ओर, पिता के पक्ष ने कोर्ट में बिल्कुल अलग कहानी पेश की है। पिता के अधिवक्ता राजेश कुमार यादव ने तर्क दिया कि उनकी बेटी 1 अप्रैल से लापता है और इसकी सूचना (NCR) थाने में पहले ही दर्ज कराई जा चुकी है।
पिता का आरोप है कि उनकी बेटी अपनी जिस सहेली के साथ रह रही है, वह उसे बहला-फुसलाकर गलत कामों में धकेलने की कोशिश कर रही है। पिता के अनुसार, बेटी को ‘सिविल सेवा’ के नाम पर गुमराह किया जा रहा है और असल में वह किसी बड़ी साजिश या गलत संगत का शिकार हो रही है।
कोर्ट में कानूनी दलीलें
युवती की ओर से अधिवक्ता ठाकुर प्रसाद दुबे ने दलील दी कि भारत का संविधान हर बालिग नागरिक को अपनी मर्जी से शिक्षा प्राप्त करने और रहने की स्वतंत्रता देता है। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति को उसकी पढ़ाई या करियर की तैयारी से रोकना उसके मौलिक अधिकारों (Right to Freedom) का हनन है।
इस संवेदनशील मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ कर रही है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने इसे एक गंभीर पारिवारिक और कानूनी गुत्थी माना है।
हाईकोर्ट का कड़ा रुख: SSP मुरादाबाद को जांच के आदेश
मामले की सच्चाई का पता लगाने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने मुरादाबाद के एसएसपी (SSP) को आदेश दिया है कि वे इस पूरे प्रकरण की जांच पुलिस उपाधीक्षक (DSP) रैंक के अधिकारी से कराएं।
कोर्ट ने विशेष रूप से यह निर्देश दिए हैं कि जांच में निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान दिया जाए:
- क्या युवती को वास्तव में सिविल सेवा की तैयारी करने से रोका जा रहा है?
- क्या युवती पर किसी प्रकार का दबाव है या वह अपनी मर्जी से सहेली के साथ रह रही है?
- पिता द्वारा लगाए गए ‘गलत कामों में धकेलने’ के आरोपों में कितनी सच्चाई है?
कोर्ट ने एसएसपी को आदेश दिया है कि वे जांच की रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में अगली सुनवाई तक पेश करें।
निष्कर्ष: शिक्षा बनाम पारिवारिक सुरक्षा
यह मामला न केवल एक कानूनी विवाद है, बल्कि समाज में बेटियों की शिक्षा और उनकी पसंद को लेकर गहरे सवाल खड़े करता है। जहाँ एक तरफ बेटी की उड़ान और उसके सपनों की बात है, वहीं दूसरी तरफ एक पिता की चिंता और सुरक्षा के दावे हैं। अब सभी की निगाहें पुलिस रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो इस मामले की अगली दिशा तय करेगी।