यूपी की राजनीति में बड़ा धमाका: क्या राज्यसभा चुनाव से पहले पाला बदलेंगे बागी विधायक? जानें अखिलेश का ‘वापसी फॉर्मूला’
उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बार फिर बड़ी हलचल देखने को मिल रही है। आगामी विधानसभा चुनावों से पहले राज्यसभा की खाली हो रही सीटों ने राज्य के राजनीतिक समीकरणों को गरमा दिया है। ताज़ा रिपोर्टों के अनुसार, समाजवादी पार्टी (सपा) के बागी विधायक एक बार फिर ‘साइकिल’ पर सवार होने की तैयारी में हैं। अमर उजाला ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक, सपा नेतृत्व ने इन बागियों की घर वापसी के लिए एक ठोस रणनीति तैयार की है, जो सीधे तौर पर आगामी राज्यसभा चुनावों से जुड़ी है।
क्या है बागी विधायकों की वापसी का पूरा गणित?
पिछले साल (फरवरी 2024) हुए राज्यसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी को बड़ा झटका लगा था जब उसके 7 विधायकों ने भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की थी। इस वजह से सपा के तीसरे उम्मीदवार आलोक रंजन चुनाव हार गए थे। हालांकि, समय का पहिया अब घूम चुका है।
सूत्रों का दावा है कि सत्ताधारी दल (भाजपा) के साथ जाने वाले कई विधायक वहां मिल रहे “अपेक्षित महत्व” की कमी से असहज महसूस कर रहे हैं। ऐसे में अखिलेश यादव ने इन विधायकों के लिए वापसी का दरवाजा खोल दिया है, लेकिन इसके साथ एक कड़ी शर्त भी रखी गई है।
‘वोट के बदले एंट्री’: समर्पण साबित करने की चुनौती
सपा आलाकमान ने साफ कर दिया है कि बागियों को माफीनामा लिखने की जरूरत नहीं है, बल्कि उन्हें अपना समर्पण (Loyalty) मैदान में साबित करना होगा।
- शर्त: नवंबर 2026 में खाली हो रही राज्यसभा की 10 सीटों के लिए होने वाले मतदान में इन विधायकों को सपा प्रत्याशियों के पक्ष में वोट करना होगा।
- प्रक्रिया: यदि बागी विधायक राज्यसभा चुनाव में पार्टी के निर्देशानुसार मतदान करते हैं, तो उनकी ससम्मान वापसी सुनिश्चित की जाएगी।
इन विधायकों पर टिकी हैं नजरें
फरवरी 2024 में क्रॉस वोटिंग करने वाले प्रमुख नामों में मनोज पांडेय, राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह, राकेश पांडेय, पूजा पाल, विनोद चतुर्वेदी और आशुतोष मौर्य शामिल थे। इनमें से मनोज पांडेय, अभय सिंह, राकेश प्रताप सिंह और पूजा पाल को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था। चर्चा है कि इनमें से कुछ विधायक पहले ही सपा नेतृत्व के संपर्क में आ चुके हैं।
विधानसभा चुनाव 2027 के लिए बड़ी बिसात
यह केवल राज्यसभा सीट जीतने की जंग नहीं है, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अपने कुनबे को मजबूत करने की कोशिश है। यदि अखिलेश यादव इन बागियों को वापस लाने में सफल रहते हैं, तो यह भाजपा के लिए एक मनोवैज्ञानिक हार होगी और सपा कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ेगा।
दूसरी ओर, भाजपा के लिए इन विधायकों को अपने पाले में बनाए रखना एक चुनौती बन गया है, क्योंकि टिकट बंटवारे और क्षेत्रीय वर्चस्व को लेकर सत्ताधारी दल के भीतर भी अपनी तरह की खींचतान बनी रहती है।