लखनऊ

यूपी में निजी स्कूलों की मनमानी पर लगाम: फीस बढ़ाने से 60 दिन पहले देनी होगी सूचना; 5 साल तक यूनिफॉर्म बदलने पर भी रोक

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ सहित पूरे प्रदेश के निजी स्कूलों में अब अभिभावकों की जेब ढीली करना आसान नहीं होगा। योगी सरकार ने ‘उत्तर प्रदेश स्ववित्तपोषित विद्यालय (शुल्क विनियमन) अधिनियम 2018’ के तहत सख्त गाइडलाइंस जारी की हैं। अब स्कूलों को नए सत्र की फीस का ब्योरा 60 दिन पहले अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक करना होगा।

जिला शुल्क नियामक समिति का हुआ गठन

​राजधानी लखनऊ में जिलाधिकारी (DM) की अध्यक्षता में जिला शुल्क नियामक समिति का गठन कर दिया गया है। जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) राकेश कुमार को इस समिति का सदस्य सचिव बनाया गया है। यह समिति न केवल स्कूलों की फीस पर नजर रखेगी, बल्कि अभिभावकों की शिकायतों का निपटारा भी करेगी।

नए नियमों की मुख्य बातें: जो हर अभिभावक को जाननी चाहिए

नियमविवरण
फीस की सूचनासत्र शुरू होने से 60 दिन पहले वेबसाइट और सूचना पट्ट पर फीस का विवरण देना अनिवार्य।
फीस वृद्धि की सीमावार्षिक फीस में अधिकतम केवल 5 प्रतिशत की ही बढ़ोतरी की जा सकती है।
यूनिफॉर्म में बदलावस्कूल अब 5 साल से पहले यूनिफॉर्म का डिजाइन या रंग नहीं बदल सकते।
खरीददारी का दबावजूते, मोजे, किताबें या यूनिफॉर्म किसी विशेष दुकान से खरीदने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा।
किस्तों में भुगतानस्कूल वार्षिक फीस एक साथ नहीं मांग सकते। फीस मासिक, त्रैमासिक या छमाही किस्तों में ली जाएगी।

उल्लंघन करने पर भारी जुर्माना और मान्यता रद्द

​जिला विद्यालय निरीक्षक के आदेशानुसार, यदि कोई स्कूल इन नियमों का पालन नहीं करता है, तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी:

  • पहली बार उल्लंघन: ₹1 लाख का जुर्माना।
  • दूसरी बार उल्लंघन: ₹5 लाख का जुर्माना।
  • तीसरी बार उल्लंघन: स्कूल की मान्यता या संबद्धता (Affiliation) वापस लेने की सिफारिश की जाएगी।

कैपिटेशन शुल्क और डोनेशन पर पूरी तरह रोक

​समिति ने स्पष्ट किया है कि प्रवेश के समय किसी भी प्रकार का ‘कैपिटेशन शुल्क’ नहीं लिया जाएगा। साथ ही, शिक्षकों या कर्मचारियों के वेतन का बोझ छात्रों की फीस में जोड़कर नहीं वसूला जा सकता। स्कूल को प्रत्येक शुल्क के लिए छात्र को रसीद (Receipt) देना अनिवार्य होगा।

शिकायत कहाँ करें?

​अभिभावक या अभिभावक संघ किसी भी शिकायत के लिए सबसे पहले स्कूल के प्रधानाचार्य से संपर्क करें। यदि स्कूल स्तर पर सुनवाई नहीं होती है, तो वे सीधे जिला शुल्क नियामक समिति के समक्ष अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं।

निष्कर्ष

​सरकार के इस कदम से निजी स्कूलों की व्यावसायिकता पर अंकुश लगने की उम्मीद है। विशेष रूप से मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए यह राहत की खबर है, जो हर साल बढ़ती फीस और यूनिफॉर्म-किताबों के अनावश्यक बदलाव से परेशान रहते थे।

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