सावधान! अगर आपका बच्चा बार-बार दोहराता है एक ही बात, तो हो सकता है ऑटिज्म; जानें पहचान और बचाव के तरीके
लखनऊ: बच्चों का विकास हर माता-पिता के लिए खुशी का विषय होता है, लेकिन कभी-कभी उनके व्यवहार में कुछ ऐसे बदलाव दिखते हैं जिन्हें हम अक्सर ‘बचपना’ समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। लखनऊ के प्रसिद्ध बलरामपुर अस्पताल के विशेषज्ञों ने हाल ही में ‘विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस’ के अवसर पर अभिभावकों को आगाह किया है कि बच्चों के व्यवहार में दिखने वाली छोटी-छोटी विसंगतियां ऑटिज्म (Autism) का संकेत हो सकती हैं।
ऑटिज्म के शुरुआती लक्षण: कैसे पहचानें?
बलरामपुर अस्पताल की निदेशक डॉ. कविता आर्या के अनुसार, ऑटिज्म के लक्षण बचपन में ही दिखाई देने लगते हैं। यदि आप अपने बच्चे में निम्नलिखित बदलाव देखते हैं, तो तुरंत विशेषज्ञ की सलाह लें:
- नजरें चुराना (Lack of Eye Contact): बच्चा बात करते समय आँखों में आँखें डालकर नहीं देखता।
- नाम पर प्रतिक्रिया न देना: बार-बार नाम पुकारने पर भी बच्चा कोई जवाब नहीं देता या अनसुना कर देता है।
- बोलने में देरी (Speech Delay): हमउम्र बच्चों की तुलना में देर से बोलना शुरू करना या बिल्कुल न बोल पाना।
- दोहराव (Repetition): एक ही शब्द, वाक्य या क्रिया को बार-बार दोहराना।
- अकेले रहना पसंद करना: दूसरे बच्चों के साथ खेलने या घुलने-मिलने में रुचि न लेना।
- दिनचर्या में बदलाव से परेशानी: अगर रोजमर्रा के कामों में थोड़ा भी बदलाव हो, तो बच्चा बहुत अधिक चिड़चिड़ा या गुस्सैल हो जाता है।
क्या ऑटिज्म का पूर्ण इलाज संभव है?
अस्पताल के विशेषज्ञों का कहना है कि ऑटिज्म का कोई “पूर्ण इलाज” (Cure) नहीं है, क्योंकि यह कोई बीमारी नहीं बल्कि एक न्यूरोलॉजिकल स्थिति है। हालांकि, डॉ. कविता आर्या ने जोर देकर कहा कि “अर्ली इंटरवेंशन” (प्रारंभिक हस्तक्षेप) से बच्चे के जीवन में बड़ा सुधार लाया जा सकता है।
- नियमित थेरेपी: स्पीच थेरेपी और बिहेवियरल थेरेपी से बच्चे के संवाद कौशल में सुधार होता है।
- विशेष शिक्षा: ऑटिज्म पीड़ित बच्चों के लिए तैयार किए गए विशेष शिक्षण तरीके उन्हें सीखने में मदद करते हैं।
- परिवार का सहयोग: माता-पिता का धैर्य और सही मार्गदर्शन बच्चे को आत्मनिर्भर बना सकता है।
जागरूकता कार्यक्रम: ‘समझो, पहचानो, बदलो’
विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस पर लखनऊ के विभिन्न संस्थानों में कार्यक्रम आयोजित किए गए। सीतापुर-हरदोई रोड स्थित एक निजी संस्थान में ‘द होप फाउंडेशन’ के सहयोग से नि:शुल्क कैंप लगाया गया। यहाँ विशेषज्ञों ने बताया कि समाज को इन बच्चों (न्यूरोडाइवर्स) के प्रति अधिक संवेदनशील होने की जरूरत है। फार्मेसी और दवाओं की भूमिका पर भी चर्चा की गई, जो व्यवहार संबंधी समस्याओं को नियंत्रित करने में सहायक हो सकती हैं।
विशेषज्ञों की सलाह
सीएमएस डॉ. हिमांशु चतुर्वेदी ने बताया कि कई बार ऑटिज्म पीड़ित बच्चे अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पाते, जिससे वे आक्रामक हो जाते हैं। ऐसे में उन्हें डांटने के बजाय उनकी भाषा को समझने की कोशिश करनी चाहिए। समय पर जांच और सही थेरेपी ही इन बच्चों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का एकमात्र रास्ता है।