लखनऊ

गुड न्यूज: नन्हे कदमों को मिली नई उड़ान, टेढ़े-मेढ़े पैर की समस्या से जूझ रहे 118 बच्चे हुए अपने पैरों पर खड़े

हाथरस: चिकित्सा जगत और मानवता के लिए हाथरस जिला अस्पताल से एक सुखद खबर सामने आई है। अस्पताल के हड्डी रोग विभाग ने पिछले चार वर्षों में एक बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए 118 बच्चों के जीवन से अंधकार को दूर किया है। जन्मजात विकलांगता यानी ‘क्लब फुट’ (Clubfoot) की समस्या से जूझ रहे ये बच्चे, जो कभी रेंगने को मजबूर थे, अब अपने पैरों पर चलने के लिए तैयार हैं।
​क्या है क्लब फुट और कितनी गंभीर है यह समस्या?
​क्लब फुट एक ऐसी स्थिति है जिसमें बच्चे के पैर जन्म से ही अंदर की ओर मुड़े होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया भर में हर 1000 बच्चों में से एक इस समस्या के साथ पैदा होता है। यदि सही समय पर इसका इलाज न हो, तो बच्चा उम्र भर के लिए दिव्यांग हो सकता है।
​हाथरस जिला अस्पताल की उपलब्धि: आंकड़ों की जुबानी
​जिला अस्पताल में संचालित विशेष ‘क्लब फुट क्लीनिक’ के माध्यम से पिछले चार सालों में उपचार का ग्राफ लगातार बढ़ा है:

वर्ष लाभान्वित बच्चों की संख्या
2022 16
2023 20
2024 38
2025 40
2026 (अब तक) 04
कुल योग 118

इलाज की आधुनिक ‘पोंसेटी तकनीक’
​हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. गोपाल वर्मा ने बताया कि इन बच्चों का इलाज ‘पोंसेटी तकनीक’ के माध्यम से किया गया है। इसमें तीन मुख्य चरण शामिल हैं:
​प्लास्टर: 4 से 6 सप्ताह तक हर हफ्ते पैर की स्थिति सुधारने के लिए नया प्लास्टर लगाया जाता है।
​टेनोटॉमी (छोटी सर्जरी): यदि जरूरत पड़े, तो एड़ी के टेंडन को ढीला करने के लिए एक मामूली सर्जरी की जाती है।
​ब्रेसिंग (विशेष जूते): पैर को सही आकार में रखने के लिए करीब पांच साल की उम्र तक बच्चों को विशेष जूते पहनने होते हैं।
​कैसे होती है पहचान और सहायता?
​एसीएमओ डॉ. राजीव गुप्ता के अनुसार, क्लब फुट के मरीजों की पहचान के लिए एक पूरा तंत्र काम करता है:
​प्रसव केंद्र: जन्म के तुरंत बाद स्वास्थ्य कर्मी पहचान करते हैं।
​आरबीएसके (RBSK): राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम की 15 टीमें गांवों में जाकर स्क्रीनिंग करती हैं।
​आशा और एएनएम: नियमित टीकाकरण के दौरान बच्चों को चिह्नित कर अस्पताल पहुँचाती हैं।
​एनजीओ सहयोग: हर शनिवार को एक एनजीओ की मदद से अस्पताल में विशेष कैंप लगाया जाता है।
​अभिभावकों के लिए महत्वपूर्ण सुझाव
​डॉक्टरों का कहना है कि उपचार में देरी होने पर हड्डियां सख्त हो जाती हैं और जटिल सर्जरी की नौबत आ जाती है। इसलिए:
​जल्द उपचार: जन्म से 3 माह के भीतर इलाज शुरू होने पर परिणाम सबसे बेहतर होते हैं।
​धैर्य और नियमितता: यह एक लंबी प्रक्रिया है, जिसमें नियमित फॉलोअप बहुत जरूरी है।
​निष्कर्ष
​हाथरस जिला अस्पताल के सीएमएस डॉ. सूर्यप्रकाश का कहना है कि अस्पताल में इस गंभीर समस्या के उपचार की पर्याप्त व्यवस्था है। 118 बच्चों का अपने पैरों पर खड़ा होना न केवल उनके परिवारों के लिए खुशी की बात है, बल्कि स्वास्थ्य विभाग की कार्यकुशलता का भी प्रमाण है।

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