वाराणसी: ₹700 की चोरी और 22 साल का इंतजार, न्याय की धीमी रफ्तार की 4 हैरान करने वाली कहानियाँ
उत्तर प्रदेश के वाराणसी की अदालतों से हाल ही में आए कुछ फैसलों ने भारतीय न्यायिक प्रक्रिया की लंबी और जटिल राह को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। मामूली विवादों और छोटे मामलों में भी इंसाफ पाने के लिए लोगों को दशकों तक कचहरी के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के अनुसार, वाराणसी की दीवानी कचहरी में 20 साल से पुराने 373 मामले आज भी लंबित हैं।
यहाँ उन 4 प्रमुख मामलों का विवरण है जो न्याय प्रणाली की ‘कछुआ चाल’ को दर्शाते हैं:
1. ₹700 का सामान और 22 साल की कानूनी लड़ाई
साल 2004 में रेलवे की संपत्ति (स्क्रैप) चोरी का एक मामला दर्ज हुआ था। आरोप था कि एक बोरी में ढलवा चौकी, सिग्नल रॉड के टुकड़े और रेल लाइन की चाबियां चोरी की गई थीं। उस समय इस सामान की कुल कीमत मात्र 700 रुपये थी। इस मामले में मुख्य आरोपी रामचंद्र प्रसाद को अपनी बेगुनाही और सजा के बीच झूलते हुए 22 साल बीत गए। अंततः कोर्ट ने उन्हें एक साल की परिवीक्षा (Probation) पर रिहा करने का आदेश दिया।
2. बेगुनाही साबित करने में लगे 26 साल
एक महिला अधिकारी, मनोरमा देवी (तत्कालीन जिला विकलांग कल्याण अधिकारी) पर साल 2000 में रिश्वत मांगने का आरोप लगा था। सतर्कता अधिष्ठान (Vigilance) ने मामला दर्ज किया था। खुद को बेगुनाह साबित करने के लिए उन्होंने 26 साल तक कानूनी लड़ाई लड़ी। अंत में, साक्ष्यों के अभाव में अदालत ने उन्हें संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया, लेकिन इस लंबी अवधि में उनके साथ के सह-आरोपी की मृत्यु भी हो गई।
3. खेत के विवाद में 22 साल बाद मिला इंसाफ
थाना कपसेठी की चिंता देवी ने साल 2004 में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि कुछ दबंग उनके खेत से सरसों की फसल उखाड़ रहे थे और विरोध करने पर उनके साथ मारपीट की गई। इस छोटे से आपराधिक मामले में आरोपियों को 3-3 साल की सजा सुनाने में अदालत को 22 साल लग गए।
4. 24 साल से ‘नदेसर शूटआउट’ के फैसले का इंतजार
वाराणसी के सबसे चर्चित मामलों में से एक ‘नदेसर शूटआउट’ (2002) आज भी फैसले की दहलीज पर खड़ा है। इस हाई-प्रोफाइल केस में पूर्व सांसद धनंजय सिंह और विधायक अभय सिंह जैसे नाम शामिल हैं। 24 साल बीत जाने के बाद भी यह मामला अभी विचाराधीन है और बहस अंतिम दौर में है।
न्यायिक प्रणाली पर उठते सवाल
ये मामले न केवल न्याय मिलने में देरी की कहानी बयां करते हैं, बल्कि यह भी बताते हैं कि आम आदमी के लिए इंसाफ की राह कितनी थका देने वाली होती है।
- लंबित मामले: वाराणसी में 373 मामले 20 साल से अधिक पुराने हैं।
- मानसिक और आर्थिक बोझ: छोटे मामलों में दशकों तक लड़ना याचिकाकर्ताओं पर भारी पड़ता है।